शहीद
सींची हो अपने लहू से जिसने, अमन -चैन की धरती
उस लहू में सोचो असर क्या होगा |
पाषाण सा दर्द भी डगमगा ना सके जिसे
हौसला वो सोचो क्या होगा |
उत्सर्ग पे जिसके खुद रो रहा ख़ुदा हो
ए ' पीर' ऐसा, अंतिम सफ़र क्या होगा |
लुटा दी हो जिसने जिंदगी कौड़ियों के दाम
क़ीमत वतन के लिए ऐसी कोई क्या देगा ।
फ़र्ज़ की ख़ातिर दी हो जिसने ख़ुशियों को तिलांजलि
बलिदानी उससे बड़ा सोचो कोई क्या होगा |
देश -हित कर गया जो अलविदा रिश्तों को
परमार्थी सोचो कोई उस जैसा कोई क्या होगा ||
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
allowed