'विरक्ति'
महलों में रहने वाला एक सुविधा संपन्न व्यक्ति क्यों अचानक विरक्त हो जाता है ये मै अब अच्छे से जान गई हूँ। आप समझ ही गए होंगे मै किस के बारे में बात कर रही हूँ जी हाँ उन्ही 'महात्मा बुद्ध' के बारे में जो सारी सुख -सुविधाएँ व अपने परिवार का मोह छोड़ कर ईश्वर - ज्ञान प्राप्ति हेतु विरक्ति के मार्ग पर चल पड़े थे।
सच कहूँ तो विरक्ति एक ऐसा भाव है जो इंसान के भीतर उतर कर उसे ये आभास करा देता है कि चिर स्थाई जैसा इस दुनिया में कुछ भी नहीं है। मै ये नहीं कहती कि अपने दायित्वों को छोड़ कर उनकी तरह हमें भी विरक्ति के मार्ग को अपनाकर अपना घर- वार छोड़ देना चाहिए। हाँ परन्तु इस संसार में रहते हुए भी मन को सांसारिक बंधनों से विलग रखना चाहिए। किसी भी चीज़ में आसक्ति हमेशा दुःख का कारण बनती है। इसलिए हर कर्म आसक्ति रहित होना चाहिए।
सांसारिक बंधन ,भौतिक चीज़े ये सब क्षणिक सुख दे सकते हैं। वास्तविक सुख तो उस अलौकिक जगत में व्याप्त उस शाश्वत सत्ता में है जिसे लोग ईश्वर कहते हैं।
वो एक ऐसा स्थाई ,सुखद सत्य है जिसे कोई झुठला नहीं सकता। असली सुख की प्राप्ति करनी है तो उस ईश्वर से अपने मन के तार जोड़े रखो ,ख़ुद को कभी अकेला नहीं पाओगे।
इस सम्पूर्ण भौतिक जगत में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो तुम्हे स्थाई सहारा दे सके। जो दुनिया की हर विपत्ति से तुम्हे बचा सके। जो अविनाशी हो।
जो आजीवन इस दुनिया में बने रहने का विश्वास दिला सके। जो ख़ुद के खोय जाने के भय से तुम्हे मुक्त कर सके।
इस संसार की किसी भी वस्तु के प्रति आसक्ति खुद के प्रति एक धोख़ा है। यदि भीतर से सुखी होना है तो इस आसक्ति को ख़त्म करना होगा या अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए भी इससे निर्लिप्त रहना होगा।वरना हर वक़्त एक अज़ीब सा भय ,दुःख ,आशंकाएँ और चिंताएँ किसी न किसी रूप में घेरे रहेंगी।
हर कर्तव्य ,हर कर्म हो लेकिन उसमें आसक्ति न हो तत्परता और निष्ठां हो बस। इस भौतिक जगत में 'वर्तमान' शीघ्र ही 'अतीत' हो जाता है। हर वक्त इस दुनिया में कुछ न कुछ अज़ीब घटित होता रहता है। अगर हम 'समता' के भाव को अपना लें तो न तो दुःख में ज़्यादा दुखी दुःखी होंगे और न सुख में सीमा से ज़्यादा सुखी।
बस ये 'सम ' भाव ही हमें कष्टों से मुक्ति दिला सकता है| इस क्षण क्षण भंगुर -संसार में निर्भय होकर जीने लायक बना सकता है। सांसारिक सुख चिरस्थाई नहीं होते है। हर वक़्त इन्हे खोने का भय बना रहता है। इसलिए ईश्वर को समर्पित कर्म कीजिए ,उससे ही मोह रखिए ,उसको ही पाने की इच्छा रखिए।तब तुम इस संसार में रहकर भी उसकी चिरस्थाई दुनिया से जुड़े रहोगे जो कभी नष्ट नहीं होने वाली है।

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