सोच उपहार की







शादी ,जन्म दिन आदि समारोह में जाने के लिए हर कोई लालायित रहता है परन्तु जब बात 'गिफ्ट ' चयन की आती है तो सबके दिमाग में ख़लबली मच जाती है।क्या दें ,क्या न दें लोग बस यही सोचते रहते हैं।
 
परिवार के सदस्यों से ,आस -पड़ौस के लोगों से सलाह ,मशवरा लिया जाता है। फिर कुछ विकल्प सामने आते हैं जिनकी उत्पत्ति निम्न विचारों  से होती है -1 -जिस व्यक्ति को गिफ्ट दिया जा रहा है उससे सम्बन्ध कितने प्रगाढ़ हैं। 2 . उसने हमारे जन्म दिन पर या घर के किसी शादी या सगाई समारोह में कितना खर्च किया था। 3 . अपने अनुमान के आधार पर -  शायद अमुक चीज़ उसे इन वजहों से पसंद आएगी। 4 .अंतिम विचार -जो उपलब्ध है उसे ही किसी न किसी तरह चेप दिया जाए।


कुछ लोगों का तो इस बारे में अलग ही फंडा होता है. ये लोग अपने परिचित सभी जनों की जन्म-तिथि की लिस्ट बना लेते हैं और किसी ऐसे मार्केट से जहाँ सस्ते दामों पर चीज़े मिलती हैं वहाँ से थोक में कुछ उपहार की  चीज़े ख़रीद कर रख लेते हैं।  फिर जन्म तिथि  के अनुसार देते जाते हैं।

कुछ इन चीजों में दिमाग लगाना शायद मूर्खता समझते हैं अत: वो पुरानी  ही किसी की दी हुई चीज़ को वापस पैक करके देना  ही उचित समझते हैं। यहाँ तक कि वो उसकी  पुरानी नेम -स्लिप हटाना भी अपने समय की बर्बादी समझते हैं। किसको दिया जा रहा है ,किसका नाम लिखा है इससे उनकी सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता।

अजी जनाब ये व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार हैं इसमें आप दख़ल देने वाले कौन होते हैं। आपको शिक़ायत का कोई हक़ नहीं है। आपकी भलाई इसी में है कि आप उसे बिना किसी शिक़वे के स्वीकार करें अन्यथा सम्बन्ध बिगड़ते देर नहीं लगेगी।  वैसे भी यहाँ तो हर किसी को मौका मिलना चाहिए फिर तो.... ..


कुछ लोग तो इतनी मासूमियत से ,इतने गर्व के साथ कुछ  भी ,कैसा भी  गिफ़्ट ऐसे  थमा देते  हैं कि हमें लगता है कि शायद हम ही इतने नासमझ  हैं जो उस ' गिफ़्ट ' में कुछ ख़ास नहीं देख पा रहे हैं।


यूँ  देखा जाए तो उपहार लेना किसी भी  आयोजन कर्ता का उद्देश्य नहीं होना चाहिए। उसे सभी उपहार सहर्ष स्वीकारने चाहिए। लेकिन  उपहार देने वाले को भी ये सोचना चाहिए की वह जो भी चीज़ दे वो उसकी और अगले की प्रतिष्ठा को आहत न करे। चतुराई दिखाकर ,चालाकी से ग़लत  व पुरानी उपयोग में ली हुई कोई भी चीज़ उपहार में न दें। उपहार कोई भी छोटा या बड़ा नहीं होता। उसे देते वक्त की भावनाएँ मायने रखती हैं।


जो भी दो ईमानदारी से दो। याद रखिए ग़रीबी और कंजूसी में अंतर होता है। एक गरीब किन्तु उदार दिलवाला व्यक्ति जो भी उपहार देगा वो निश्चित ही अमूल्य और ग्रहण करने योग्य होगा।  इसलिए उपहार दो तो  सद्भावना के साथ वरना दिखावे की भावना से दिए गए शुभ -कामना रहित उपहार का कोई अर्थ नहीं है।








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