उलझा मन
ये ज़िंदगी का तज़ुर्बा हसीन,हर कोई बरख़ुरदार नहीं रखता।
यहाँ हर शख़्स कुछ अधूरी ख़्वाहिशें ,दिल में कुछ मलाल रखता है.
हर कोई उलझा है हाथों की लक़ीरों में
मुखौटो में छुपा के हर कोई अपना हाल रखता है.
सामान बेशक़ीमती घरों में लेकिन
मिज़ाज़ बीमार ,सेहत फटेहाल रखता है।
टूटते हुए रिश्तों की बेचारगी सी लेकर
खड़ा हो कटघरे में ,ख़ुद के लिए कई सवाल रखता है।
पहरेदारी है हक़ीक़त पर सपनों की बेहद
भूत-भविष्य का जी को जंजाल रखता है।
बिक चुका है आराम ख़ुद ही के हाथों से
पाने का फिर भी उसी को ,नाहक ख़याल रखता है।

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