मूक दर्शक
कुछ नहीं बोलूँगी बस इतना कह दो कि मृत प्राय : हो चुकी हैं संवेदनाएँ तुम्हारी
और अब अहसास भी नहीं होता किसी की पीड़ा का तुम्हे
क्योंकि पत्थरों से सिर टकराने की आदत नहीं है मेरी।
हर बात तुम तक पहुँचें पर प्रतिक्रिया शून्य हो तो
समझा जा सकता है कि उस परिवेश से आगे निकल आए हो तुम
जहाँ तुम्हें इंसानियत का अहसास था
अब जीने लगे हो भाव-हीन ,निरंकुश ,निष्ठुर दुनिया में
जहाँ कोई मानवीय पीड़ा ,कोई अनाचार तुम्हें व्याकुल नहीं करता
किसी दुर्भाव से तुम्हें कोई रंजिश नहीं होती।
इस नीरवता को धारण कर तुम ख़ुद को शांत और
अहिंसक सिद्ध करना चाहते हो तो जाओ
मै तुम्हें कायर ,धर्म -विमुख और पलायनवादी घोषित करती हूँ।
बोलो स्वीकार करते हो ! रहने दो ,बने रहो यूँही मूकदर्शक।
-अंशु चौहान

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