'भिंडी रही इठलाई'




सारी सब्ज़ी औनी -पौनी ,भिंडी सबके मनको भाई

छरहरी काया में सिमटी, बीच सब्ज़ी संग इठलाई।

फ़ेरी वाले ने जैसे ही 'भिंडी 'की आवाज़ लगाई

बच्चों ने ज़िद करके सुबह -शाम बनवाई।

पूछो इनसे सब्ज़ी में ,क्या है आज बनाना

झट बोलेंगे खाने में बस, भिंडी ही है खाना।

टिंडे,कद्दू ,तुरई की अब तो, भैया शामत आई

मुँह फुलाए बैठी हैं सब ,कोई इनको भी पूछो भाई।

सारी सब्ज़ी करती हैं शिकायत ,भिंडी तूने की क्या चतुराई

तुझ पर ही आ कर रुकते सब, हम तक नज़र ना आई।

सब्ज़ी -मंडी ,गली ,मौहल्ले की रेड़ी  पर तूने ही धाक जमाई

इस गर्मी में  बची -कुची सी, हम रही कुम्हलाई।

-अंशु चौहान





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