भटकता पथिक
मुझे बता ए पथिक ज़रा ,किस पथ पर तू चलता है
पग -पग ठोकर ,दर्द बहुतेरे
पथरीली इन राहों पर, क्या ध्येय लिए निकलता है।
आनी -जानी सी हैं सांसें ,ना देह तत्व अविनाशी है
क्या पाने की इच्छा जग में, किस फल का अभिलाषी है।
दलदल सा जग ,मृग -मरीचिका ,उतना धसता जितना रमता है
नित्य नए -नए सपने बुनकर ,ख़ुद ही क्यूँ उलझता है।
कभी आह्लादित ,कभी रुदन सा ,ये जीवन राग अनूठा है
एक पल मीठा स्वाद है इसका, तो अगले पल खट्टा है।
नहीं कहती सब मोह त्याग दे ,कर्तव्यों का निर्वाह न कर
लेकिन मुक्त वही यहाँ पर, जो प्रभु अनुचर हो
भक्ति -पथ हेतु निकलता है।

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