नेकी की राह







हाथों में थाम कर चलते हैं नेक़ी, हल्की बहुत है

ढोते क्यों बोझ बदी का ,भारी बहुत था। 

उसकी पाक़ नसीहत अब  दिल में उतर गई है 

आवारगी में भटकना मेरा शगल था।

समेट कर अपने हिस्से की गुस्ताख़ियों को

छोड़ आया हूँ जहाँ अँधेरा बहुत था।

लौट आया हूँ रौशनी की उस राह पर मै

मासूमियत का जहाँ सवेरा  बहुत था।

ये जो मेरी रूह पर अमन का असर है

आया है जहाँ से, सद्भावनाओं का बसेरा बहुत था।

























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