'महफ़िल की बातें '
हो वाणी कटु तो मौन अच्छा लगता है
न हो शरारत तो बचपन कहाँ लगता है
ताव में आकर करते हैं जो भी वादे वो
गच्चा सा लगता है
परत दर परत खुलता है राज़ यूं
परांठा हो मानो कोई लच्छा सा लगता है
शिक़ायत में महफ़िल जमाना वो सबका
हर शख़्स कानों का कच्चा सा लगता है ।
-अंशु चौहान
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