ज़लज़लों के शहर

ये ज़लज़लों के शहर हो गए
आशियानों पर इनके
क़ुदरत के क़हर हो गए
मायूसियाँ सी पसरी हैं चेहरों पर महज़
घर ख़ाली हैं और सड़कों पर बसर हो गए
तोड़ते हैं दम कहीं साहस ,अरमां ,अठखेलियां
संवेदना पर विनाश के गहरे असर हो गए
ये ज़लज़लों के शहर हो गए
है भूख भी ,प्यास भी और अधूरी आस भी
टूट कर ये सभी  शोक में बिफ़र रो गए
ये ज़लज़लों के शहर हो गए
सर्द ,गर्म मौसम कोई छत इसी नभ तले
दर्द से बेअसर इनके सबर हो गए
ये ज़लज़लों के शहर हो गए



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