'स्वच्छता' एक सभ्य और उन्नत समाज या राष्ट्र की ज़रूरत और ज़िम्मेदारी दोनों ही है । जी हाँ किसी भी देश की प्रगति में सफ़ाई की बहुत बड़ी भूमिका होती है क्योंकि स्वच्छता इंसान की मानसिक स्थिति को भी प्रभावित करती है | स्वच्छ जगह से हमारी मानसिकता भी सकारात्मक होती है और एक ऊर्जा का संचार होता है । स्वच्छता हमे मानसिक व शारीरिक तौर से स्वस्थ बनाती है । जरा सोचिए कि आप जहाँ काम करते हैं वहाँ कचरे का ढेर पड़ा हुआ है ,आपको अजीबोग़रीब बदबुएं आ रही हैं तो न तो आप काम कर पाएंगे और न ही उस माहौल में स्वस्थ रह पाएंगे अत: अपने आस-पास का वातावरण स्वच्छ बनाए रखना हमारी एक प्रमु ख ज़िम्मेदारी बनती है । बहुत बुरा लगता है जब किसी सड़क के किनारे ,या किसी भी गली से निकलते वक्त कचरे के ढेर का सामना होता है । क्यों हम अपने व अपने समाज की स्वच्छता से कोई सरोकार नहीं रखते आख़िर में इस लापरवाही का दुष्परिणाम तो बीमारियों के रूप में हमे ही भुगतना होता है । हम क्यों नहीं जागरूक होते पहले से ही । विदेशों में सफ़ाई व्यवस्था की तारीफ़ तो हम दिल खोल के करते हैं परंतु अपने देश को स्वच्छ बनाए रखने की जब बात आती है तो हम मूक हो बन जाते हैं । हमे अपने देश को पर्यटन की दृष्टि या स्वास्थ्य की दृष्टि से सफल बनाना है तो इस और ध्यान देना ही होगा । कचरा जगह -जगह न फैलाएं ,सड़क के एक और कचरा पात्र लगे हो जिनके अंदर ही कचरा डाला जाए । जगह -जगह थूकने की अशिष्ट आदत को सुधारा जाए तभी हम देश की तरक्की व उन्नति की कल्पना कर सकते हैं ।
मनुष्य हो तो मनुष्य बन रहो
मृत्यु के भय से अगर सही को सही और गलत को गलत ना कह सको,तो सन्देह करो अपने मनुष्य होने पर . शक्तिशाली हो कर अगर किसी निर्बल की शक्ति न बन सको,तो संदेह करो अपने शक्तिशाली होने पर. संपन्न हो कर अगर मदद ना कर सको किसी निर्धन की,तो सन्देह करो अपनी सम्पन्नता पर . पुरुष हो कर अगर किसी नारी के सम्मान की रक्षा न कर सको,तो संदेह करो अपने पौरुष पर। धार्मिक हो कर भी अगर धर्म की रक्षा न कर सको, तो धिक्कार तुम्हारे धार्मिक होने पर. मनुष्य हो तो मनुष्य बन रहो इस धरा पर, सिर्फ देह मनुष्य की होना ही मनुष्यता नहीं, समझो इस ध्येय को तो इंसान हो तुम ना समझो तो चारा चर रहो कही। -
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