सभी माँ -बाप अपनी संतानों को बहुत प्यार करते हैं और उनकी हर संभव यही कोशिश रहती है की वे बच्चे की हर इच्छा को पूरा करें । ये सही है की संतान की इच्छा का ध्यान रखना माँ-बाप का फ़र्ज होता है परंतु बच्चों की अनावश्यक ,अनैतिक व अतार्किक इच्छाओं को पूरा करना पूर्णतया ग़लत है ।बच्चों को हर क्षेत्र में उनकी सीमांओं के बारे में बताना बहुत ज़रूरी है । जो काम संवैधानिक तौर पर ग़लत है उसे करने से उन्हें रोकना चाहिए चाहे उस काम को करने के लिए वो कितने ही अधीर हों वरना दुष्परिणाम माँ-बाप को ही झेलने होंगे । उदाहरण के लिए -यदि आप 18 से कम साल के अपने पुत्र या पुत्री को गाड़ी चलाने के लिए देते हैं तो न तो ये आप के हित में है न उसके न ही किसी तीसरे के । अगर कोई भी दुर्घटना उसके द्वारा की जाती है तो आपको जेल व जुर्माना दोनों ही चीजों को भुगतना पड़ सकता हैऔर जिसको आपने क्षति पहुंचाई हैं उसकी बद्दुआएं व दुश्मनी भी झेलनी पड़ेंगी। मैं नहीं समझती कि कोई भी समझदार व आदर्श माता-पिता अपनी संतान के लिए ये चीजें चुनना पसंद करेंगे । इसलिए अपनी संतान को बिजी सड़क पर ईयर -फोन लगाकर गाना सुनने से ,तेज रफ़्तार में गाड़ी चलाने से ,व 18 की ऐज से पहले गाङी (बिना लाइसेंस )के चलाने से सख़्ती से मना करना चाहिए । आजकल कई किशोर बच्चे सड़क पर स्टंट दिखाते नज़र आते हैं जो ख़ुद के साथ -साथ दूसरों के लिए भी जोख़िम भरा है । अत; सभी समझदार माँ -बाप से व सभी सभ्य नागरिकों से यही अनुरोध है कि अपने ,दूसरों के व देश के हित में बच्चों को ऐसे अधिकार व स्वतंत्रता न दे जो दूसरों की ज़िन्दगी पर भरी पड़ जाए क्योंकि बच्चे की ग़ैर ज़रूरी इच्छाए व अधिकार उसके स्वयं व अन्य की ज़िन्दगी से ज़ियादा ज़रूरी नहीं हैं ।
मनुष्य हो तो मनुष्य बन रहो
मृत्यु के भय से अगर सही को सही और गलत को गलत ना कह सको,तो सन्देह करो अपने मनुष्य होने पर . शक्तिशाली हो कर अगर किसी निर्बल की शक्ति न बन सको,तो संदेह करो अपने शक्तिशाली होने पर. संपन्न हो कर अगर मदद ना कर सको किसी निर्धन की,तो सन्देह करो अपनी सम्पन्नता पर . पुरुष हो कर अगर किसी नारी के सम्मान की रक्षा न कर सको,तो संदेह करो अपने पौरुष पर। धार्मिक हो कर भी अगर धर्म की रक्षा न कर सको, तो धिक्कार तुम्हारे धार्मिक होने पर. मनुष्य हो तो मनुष्य बन रहो इस धरा पर, सिर्फ देह मनुष्य की होना ही मनुष्यता नहीं, समझो इस ध्येय को तो इंसान हो तुम ना समझो तो चारा चर रहो कही। -
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