'मौत' ऐसे तो ज़िन्दगी का एक अंतिम सत्य है परंतु इस में भी बड़ा अंतर होता है- जैसे एक अपराधी की मौत
और एक सैनिक की मौत । एक सैनिक की मौत एक योद्धा के वीरगति प्राप्त करने जैसी होती है जिसे शहादत कहा जाता है जबकि एक अपराधी की मृत्यु कभी भी शहादत नहीं कही जा सकती । एक सैनिक जब शहीद होता है तो उसको बड़े ही सम्मानपूर्ण तरीके से विदा किया जाता ।उसे सलामी दी जाती है ,उसके परिजन भी उसकी शहादत पर गर्व महसूस करते हैं । वो मर कर भी अमर हो जाता है । इसके विपरीत अपराधी व्यक्ति की मौत के बाद उसके मरने पर किसी को कोई अफ़सोस नहीं होता और सभी पीछे से गाली देकर उसकी निंदा भी करते है ।उसे कोई याद करना पसंद नहीं करता जबकि शहीद हर किसी के दिल में बस जाता है । शहीद की शहादत पर मन नतमस्तक हो जाता है जबकि अपराधी की मौत का कोई ज़िक्र भी करना पसंद नहीं करता । इसलिए ईश्वर ने हमें जितनी भी ज़िंदगी दी है उसे सैनिक की तरह ,एक योद्धा की तरह जीनी चाहिए । हमे अपनी शक्ति का प्रयोग कमज़ोर व असहाय व्यक्ति की सहायता में करना चाहिए न की इसे लड़ाई और अनावश्यक कार्यों के प्रदर्शन में लगाना चाहिए । दोस्तों यदि आपने 'जिम' जा -जाकर अपनी अच्छी सेहत बनाई हुई है और रास्ते में किसी असमर्थ व्यक्ति की सहायता के लिए तुम्हारे हाथ नहीं उठे तो समझ लो के तुमने ज़िम में अपने धन और श्रम दोनों को बर्बाद किया हैं । अत;अच्छाई के मार्ग पर चल कर किसी के काम आने की कोशिश कीजिए और सैनिक जैसा जज़्बा लेकर जिंदगी को सही मायने दीजिए और जो सही राह से भटके हैं या जिनके भटकने का अंदेशा है उन्हें सावधान कीजिए । ये मनुष्य जन्म बड़े सद्कर्मो और मुश्किलों के उपरांत मिलता है इसे शुभ कर्मों से सार्थक बनाइये ...... ;;;;
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