प्रेम एक सकारात्मक शब्द है । ईश्वर ने भी प्रेम को बहुत महत्व दिया है परंतु ये याद रहे कि प्रेम में मर्यादा का बहुत महत्व है। प्रेम का स्वरूप क्या है ये मायने रखता है । अमर्यादित प्रेम करने वाला हमेशा दंड का भागीदार होता है चाहे वह दंड ईश्वर द्वारा निर्धारित किया जाए या लोगों द्वारा ।प्रश्न ये उठता है कि कई बार प्रेम करने वालों को दंड क्यों मिलता है ?प्रेम करना ग़लत कैसे हो सकता है ?ग़लत तो किसी से नफ़रत करना होता है । लेकिन इसका जवाब ये ही है कि जब -जब इंसान ने अपनी मर्यादा या सीमा का उल्लंघन किया है उसे दंड मिला है । अत: प्रेम में यदि रिश्तों के अनुसार पवित्रता और मर्यादा का निर्वहन हो तो प्रेम कभी भी ग़लत नहीं हो सकता । सभी से प्रेम करें मग़र वैचारिक शुद्धता और मर्यादा में रहकर । किसी पुरुष का स्त्री से और स्त्री का पुरुष से प्रेम करना ग़लत तब तक है जब तक की उसमे पवित्रता व मर्यादा नहीं है अन्यथा प्रेम कभी ग़लत नहीं होता। यदि कोई पुरुष एक स्त्री से या एक स्त्री एक पुरुष से प्रेम करते हैं लेकिन उनके भाव शुद्ध व मर्यादित नहीं हैं तो ऐसे स्त्री -पुरुष को चरित्रहीन की संज्ञा दी जा सकती हैं क्योंकि भाव से ही रिश्तों का निर्वहन व निर्धारण होता हैं वरना तो संसार के सभी प्राणियों का अंतर सिर्फ़ स्त्री -पुरुष के रूप में ही है । प्रेम समर्पण हैं ।ये किसी को शक्तिपूर्ण तरीके से हासिल करना नहीं हैं । इसमें किसी को हानि पहुँचाने की भावना तो बिल्कुल भी नहीं होनी चाहिए । प्रेम त्याग का नाम है हासिल करने का नहीं ।
मनुष्य हो तो मनुष्य बन रहो
मृत्यु के भय से अगर सही को सही और गलत को गलत ना कह सको,तो सन्देह करो अपने मनुष्य होने पर . शक्तिशाली हो कर अगर किसी निर्बल की शक्ति न बन सको,तो संदेह करो अपने शक्तिशाली होने पर. संपन्न हो कर अगर मदद ना कर सको किसी निर्धन की,तो सन्देह करो अपनी सम्पन्नता पर . पुरुष हो कर अगर किसी नारी के सम्मान की रक्षा न कर सको,तो संदेह करो अपने पौरुष पर। धार्मिक हो कर भी अगर धर्म की रक्षा न कर सको, तो धिक्कार तुम्हारे धार्मिक होने पर. मनुष्य हो तो मनुष्य बन रहो इस धरा पर, सिर्फ देह मनुष्य की होना ही मनुष्यता नहीं, समझो इस ध्येय को तो इंसान हो तुम ना समझो तो चारा चर रहो कही। -
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