प्रतिरोध











कई बार समेट लेती हूँ मन में उठे प्रतिरोध को
दबा लेती हूँ क्रोध की अग्नि को सिर्फ़ इसलिए
कि सयंमित और शांत रहना चाहती हूँ
मग़र जब भी कुछ ग़लत होते हुए देखती हूँ
तो एक शक्ति मेरे आक्रोश को उद्वेलित करती है तब
मैं तोड़ देना चाहती हूँ उस वक़्त हर मानसिक बंधन को
जो मज़बूर करते हैं मुझे उस ग़लत को सहन कर निर्विरोध रहने के लिए
हाँ मुझमें आक्रोश है हर उस ग़लत विचार ,आलोचना ,परम्परा और अतार्किक हठ के लिए
जो अनाधिकार अपना साम्राज्य फ़ैलाने की निरर्थक कोशिश करती जाती हैं ,और चाहती हैं
कि मैं आत्म -समर्पण कर दूँ और एक शब्द न बोलूँ उस विरोध में।




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