'वो नन्ही बच्ची'
इसे बचकानी हरक़त कहें या अपनी उम्र से अधिक परिपक्वता लिए घर की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए, एक अबोध बालिका द्वारा की गई हठ। जो भी हो मग़र इस लड़की का ये प्रयास निश्चित रूप से सराहनीय है। तारीफ़ के काबिल है क्योंकि इस बच्ची की सोच सकारात्मक है तभी इसने चोरी जैसी दूसरी ग़लत चीज़ों में दिमाग़ न लगाकर ये मेहनत और ईमानदारी वाला कार्य चुना। ये नन्ही बालिका सुबह कुछ 'सहजन 'की फलियों को पेड़ से तोड़ कर एक सब्ज़ी वाले की तरह दुकान लगाकर पार्क में बैठ जाती है और वहाँ से गुज़र रहे हर शख़्स से ये फलियां ख़रीदने का अनुरोध करती है। यद्यपि सुबह से शाम तक उसके पात्र में मात्र 2 रुपए ही एकत्र हो पाते थे लेकिन जिंदगी में कुछ कर गुज़रने की, आगे बढ़ने की चाह इस बच्ची में स्पष्ट दिखाई दे रही थी .मेरे पूछने पर की तुम क्या बनना चाहती हो उसने बड़ी मासूमियत से कहा ड़ॉक्टर। घरों में काम करने वाली बाई जी की इस बेटी के हौसले बुलंद हैं। ये 3 भाई -बहन हैं। पिता इस दुनिया में नहीं हैं। शायद इसी मज़बूरी ने इसे इतना मानसिक- परिपक़्व बना दिया है।

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