बुढ़ापा




उम्र के इस पड़ाव पर जिन्दगी थमी सी लगे है
रिश्तों में मिठास की कमी सी लगे है 
तमाम उम्र त्याग  किया जिनके लिए 
आज उनसे ही आँखों में नमी सी लगे है 
गुज़र गए जो पल आज के इंतज़ार में 
आज उन्ही को पाने की मर्ज़ी सी लगे है 
खत्म हो गयी है यूँ तो हर ख्वाहिश दिल की  
ज़िन्दगी फिर भी तमन्नाओँ  की अर्ज़ी सी लगे है 
किसी से कुछ कहने की ज़ुर्रत भी नहीं होती 
इस ख़याल में ही जाने क्यों खुदगर्ज़ी सी लगे है 
दिखाने को तो मीठा बोल लेते हैं लोग 
दिल में मग़र सबके बेदर्दी सी लगे है 
ये बुढ़ापा भी सचमुच सताता है कितना 
आ जाए तो बस बेक़द्री सी लगे है ।


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