शाख़ से गिरे पत्ते
मै शाख़ पर जब तक था अच्छा था
आतिशजनों ने समेट लिया ख़ाक में मिलाने के लिए
मै बिखरा हुआ था जब बहुत अच्छा था
मुझ से ही इन शाख़ों की शान हुआ करती थी
छाँव में सभाएँ आम हुआ करती थीं
सरे -राह भटक रहा हूँ जब से ज़र -ज़र हुआ
मै पहले बहुत अच्छा था जब बच्चा था
मन भी हरा-भरा था ,थी तन में संजीवनी हरियाली
पीत -वर्ण हो झड़ रहा हूँ अब
मै ख़ुश था जब शाख़ से टूटा नहीं था
मिलने को हैं अब ख़ाक में मेरी सभी नेकियाँ
देख कर हॅसने लगी हैं मुझको नई कोपलें
मै ख़ुश था बहुत जब इन्होनें दंभ से मुझको देखा नहीं था।

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