जीव हत्या
एक निरीह ,बेज़ुबान पशु जो न किसी चीज़ का प्रतिरोध कर सकता है, न अपनी पीड़ा किसी को बता सकता है । जो न चाहते हुए भी अपनी गर्दन पर चाकू का बार झेलता है ,जो आंसू में न जाने कैसे इतना दर्द छुपाकर खुद को स्वयं पर बार करने वाले के सामने समर्पित कर देता है, कैसे रोक लूँ खुद को उसकी शहादत पर अश्क बहाने से । इन निरीह जानवरों का दर्द व आंसू मेरी आत्मा को कचौटते हैं ,मुझे चैन से सोने नहीं देते ।
मैं तड़प उठती हूँ कहीं कटने के लिए जा रहे निःशब्द ,मासूम से पशुओं को देखकर । जी होता है कि किसी भी तरह इन्हें बचा लूँ और अभय दान देकर इनकी पीड़ा दूर कर दूं । कभी मन करता है कि ईश्वर काश मुझे ऐसी कुछ अद्भुत शक्तियां दे दे कि मैं इन भोले -भाले जानवरो की किसी भी स्थान पर तुरंत मदद कर सकूँ।
मुझे पता है ये असंभव है और इसके बिना मैं कुछ कर भी नहीं सकती क्योंकि किसी भी गलत चीज़ को ग़लत साबित करना और उसका विरोध करना इस कलयुग में इतना आसान नहीं है।
आशा कि एक किरण दिखाई दी जब एक अख़बार में मैंने पढ़ा कि जोधपुर में एक ऐसी जगह (मोकलवास ) है जहाँ बकरों के लिए अद्भुत शरणगाह बड़ा धर्मपुरा में स्थित है । ओसवाल सिंह सभा की ओर से संचालित धर्मपुरा बकरशाला में करीबन ८०० बकरे पूर्ण सुरक्षित जीवन जी रहे हैं । यहाँ जनसहयोग से इन पर लाखों का ख़र्च किया जाता है । जोधपुर के तत्कालीन महाराजा जीव -हत्या के विरोधी थे उनके ही प्रयासों से मोकलावास में बड़ा धर्मपुरा बनवाया गया था । अभी यहाँ ३००० हज़ार बकरों को अभय दान दिया गया जो की बहुत ही सराहनीय क़दम है । जीव हत्या किसी भी तरह से तार्किक या धार्मिक नहीं हो सकती क्योंकि ईश्वर हमेशा ही जीवों से प्रेम करने की ,व अहिंसा की प्रेरणा देते रहे हैं ।
खुद के बचाव में ये तर्क देना कि बकरे ,मुर्गे यदि नहीं खाए जाएंगे तो इनकी संख्या बढ़ जाएगी, ये सड़ जाएंगे आदि तर्क देना अनर्गल है।
क्योंकि सृष्टि के संचालन का ज़िम्मा भगवान का है और हमे प्रभु ने किसी के भी प्राण लेने का हक़ नहीं दिया है
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