हसरतें
हसरतें कब ज़मी पे पैर रख कर चला करती हैं
कब अनजान राह पर चल कर सही मंज़िल मिला करती है
करे तो करे जहाँ लाख सितम उन पर
वक़्त आने पर सज़ा सबको मिला करती है
मुद्द्तों से नज़रे उसके दीदार को तरसती थीं
झुक जाती हैं अब शर्म से जब भी मिला करती है
एक तेरी मोहब्बत की ख़ुशी क्या कम है
कब ज़माने में सभी की मोहब्बत मिला करती है
सहम जाते हैं अक्सर जुदाई के डर से
बड़ी मुश्किल से मिलन की रातें मिला करती हैं ।
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