गीत
जब से पाया है तुम्हे  दिल दूरियों से डरता है ,रौनके महफ़िल से भी अब कहाँ  बहलता है ।

स्थायी -यूं तो हर रोज गुज़र जाता है पर वो अहसासे चाहत नहीं मिल पाता है
अंतरा -मैंने रो-रोकर गुजारी हैं जुदाई की घड़ियाँ ,हरेक अश्कों ने सजाई हैं तन्हाई की लड़ियाँ
अब तो दिल दर्द भरे गीत गुनगुनाता है ।
यूं तो ....................................................................................................................
अंतरा-हम तो मजबूर हैं आपकी चाहत में सनम ,तुमको पाने को मचलता है मेरा दीवाना मन
मुझको तेरे सिवा कहीं चैन नहीं आता है ।
यूं तो ......................................................................................................................

इसकी स्वर -रचना भी मैंने ही की है ,मै उम्मीद करती हूँ जल्द ही मेरी रचनाओं का एक संगीतमय संकलन निकले । प्रभु की इनायत हो । 

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