क्यों लगता है कहीं कुछ छूट गया है
एक खालीपन सा संग चलता है
तीरगी है दिल की गलियों में
उजाला मुझे ये क्यों छलता है
इल्म नहीं है मुझे खुदा का
दीप आलय में रोज जलता है
जलजले तो जमीं पे आते हैं लेकिन
जहन मेरा ये क्यों हिलता है
यूं तो सब्र से काम लिया है
बस अब के थोड़ा कम लगता है । अंशु चौहान (१ ९९४ )
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