बाइक  पार्क करने  की बात को लेकर दो समुदायों में हुए दंगों  ने ये सिद्ध  कर दिया है कि मनुष्य की सोच आज कितनी संकीर्ण और आत्म केन्द्रित हो गई है । आज लोगों में सहनशीलता और परस्पर  प्रेम की भावना कहीं विलुप्त हो गई है । यूँ तो हमने मनुष्य के रूप में जन्म लिया है परन्तु मनुष्य होने के नाते जो मानवीय गुण हमारे भीतर होने चाहिए उनका हम सब में आज अभाव है । आज का मनुष्य स्व से ऊपर उठना ही नहीं चाहता है।  वह उसी बात को सुनना पसंद करता है जो उसके लिए उपयुक्त हो ,जिससे उसके हित की सिद्धि होती हो ।  कितनी अजीव बात है कि हम अपने क्षुद्र  स्वार्थों के लिए किसी की जान लेने के लिए भी आतुर हो जाते हैं ,किसी का कुछ भी व किसी भी हद तक बुरा सोच लेते हैं । मनुष्य कभी ये नहीं सोचता की ये सारी सृष्टी ,इसका हरेक व्यक्ति सब एक दूसरे से कहीं न कहीं जुड़े हुए हैं और एक दूसरे के काम आ रहे हैं । जब हम आपसी सहयोग और प्रेम की भावना का त्याग कर देंगे तो एक दिन खुद ही तन्हा हो जाएंगे । जब तक व्यक्ति अपने अहम् को सर्वोपरि रखेगा तब तक परमार्थ  की भावना का आविर्भाव  नहीं होगा और इंसानियत यूँही शर्मसार  होती रहेगी । यदि हम सच्चे अर्थों में इंसान हैं तो हमे अपने अन्दर की बुराइयों  को ख़त्म करना होगा जैसे घृणा ,द्वेष  ईर्ष्या आदि अन्यथा हम में और पशुओं में कोई फर्क नहीं होगा । एक विवेक ही तो है जो हमें पशुओं से श्रेष्ठ बनाता है जिसके होते हम अपना मनुष्य जन्म सार्थक कर सकते हैं वरना बाकी सब कार्य तो  पशु भी कर लेते हैं।   ' ये है जन्म मनुष्य का जो यूँही नहीं मिलता
ये सफ़र है चौरासी का जो काटने में कई जन्म निकल जाते है । 

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