'रिक्शावाला '


भरी दुपहरी हो या फिर जाड़ों की हो शाम
राह ए मुसाफ़िर को ढोना ही है बस उसका काम
वो भी मानव तू भी मानव
है पीड़ा का अनुभव भी सम
लेकिन तेरी पीड़ा महँगी
उसके श्रम की पीड़ा के तू लगा सके है दाम
उसकी किस्मत में ढोना है तेरी में है मौज ए सवार
तू तो है आराम का आदी
उसकी नियति है ये थकान
पर चलती जीविका उसकी तुझसे
मान गए उस पर तेरा अहसान ।
-अंशु चौहान

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