हर बार एक जिद करके बैठ जाती  हूँ कि अब नहीं हारूँगी मगर ये जिद मेरे अपरिपक्व विस्वास  की होती है ,फिर एक सच से सामना होता है जहाँ मेरे सारे भ्रम टूट जाते हैं । मैं हारने लगती हूँ उन स्थापित
काल्पनिक उम्मीदों से जो मुझे यथार्थ के धरातल पर धकेल देती हैं । हाँ मै मानती
हूँ ,मुझे अहसास हो गया है अब कि मै यथार्थ की इस दुनिया में कुछ भी नहीं हूँ । अभी बहुत कुछ पाना बाकी  है अपनी महत्ता दर्शाने के लिए और अपने हर कथन पर लोगों की वाहवाही लूटने के लिए । मुझे प्रतिबंधित होना पड़ेगा अपने विरोधियों का विरोध सहने के लिए। मुझे बचाय रखनी होगी एक फीकी सी मुस्कान अपने विरोधियों के अभिवादन के लिए । जब मै इस कार्य में इतनी दक्ष हो जाऊंगी कि लोगों को इस बात का अहसास ही न हो कि वह मेरी कृत्रिम हंसी है या प्राकृतिक तब मै मान लूंगी कि मै सक्षम हो गई हूँ ऊँचा उठने के लिए  ,कुछ अच्छा अर्जित करने के लिए अन्यथा  मै   यूंही जूझती रहूँगी ख्याति प्राप्त लोगों की दुनिया में अपना अस्तित्व ढूँढने के लिए । अब तो खुश हो न तुम ?यही सब सुनना चाहते थे ना तुम अपने अहम्  की संतुष्टि के लिए .......। 

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