काश
ये जो गाडोलिया लौहार से हम यहाँ- वहाँ फिरते हैंक्यों होता गर रहने को एक मकान होता ।
बार-बार मेरी गैरत को ये जो चोट पहुँचाता है कोई
कब मुमकिन था जो हांसिल ऊँचा मुक़ाम होता ।
मजबूर हूँ जो इस कदर आज मै ना होती
मेहरबां जो मुझपे ख़ुदा तमाम होता ।
मिल सका ना वो जिसकी तम्मन्ना की
सोचती हूँ अक्सर
दुआओं का ये तो ईनाम नहीं होता ।
ये जो रुका -रुका सा हरपल लगता है मुझको
इस तरहा तो ज़िन्दगी से इत्मिनान नहीं होता ।
तस्वीर साभार गूगल
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