मन  के  पृष्ठों  पर उभरी हुई लकीरों को
शब्द -चित्रों  का रूप दान दान  तो  कर
हो हक़ तेरा भी अदा सृजन के लिए सृष्टि में
अपनी दिव्य कला से कुछ निर्माण तो कर
कितने हुनर से बनाते हैं पक्षी भी आशियाँ  अपना
तू कला  मर्मज्ञ अपनी प्रतिभा गुमनाम न कर
मुन्जमिद है जो गर्द दुशवारी की तेरे  माथे  पर
करके साफ़ अपने कौशल से सबको  हैरान तो कर
ये जरूरी  भी नहीं सारा श्रेय तुझको मिले
अनाम ही सही अपना श्रम कुर्बान तो कर । । 

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