नारी की दुविधा
एक नारी की दुविधा !पुरुष की किसी बात का उत्तर मुस्कुरा कर दे तो' लूज़ कैरेक्टर । 'जबाव देते वक़्त ना मुस्कुराए तो ख़ड़ूस।' भाई 'संबोधित करे तो गवार और संबोधन ना करे तो बदतमीज़। आख़िर पुरुष स्त्री के व्यवहार को सामान्य और सहज क्यों नहीं ले पाते । क्यों अपनी सोच पर निरर्थक जोर दे कर अनजाने आशय निकालते रहते हैं । क्यों सहज होकर संवाद नहीं करते।
Fb पर आई किसी भी फ्रेंड रिक्वेस्ट को सहज और सीधे मन से स्वीकार कर ले तो गलत ,ना करे तो महान घमंडी. कभी तो दृष्टिकोण देह से आत्मा की तरफ बदलो .कभी तो संकुचित से व्यापक की तरफ बढ़ो.
पूर्वाग्रह, दुराग्रह और मलिन सोच क्या इन्ही के साथ ही संबंध निर्वहन होगा एक स्त्री -पुरुष का।
क्या शरीर से ऊपर आत्म दृष्टि द्वारा दृष्टिपात नहीं हो सकता एक पुरुष का स्त्री पर.

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