तन्हा किशोर
प्रकृति की मार देखो ,माँ-बाप के होते हुए भी वो अनाथ सा जीवन जीने को मज़बूर है । १५ साल का ये किशोर बालक वक़्त के हाँथो की कठपुतली बना हुआ है । बचपन में ही इसकी माँ इसके पिता को छोड़ कर कहीं और चली गई । बालक का पिता भी बालक को छोड़ कर किसी दूसरे शहर में रहने चला गया। बच्चा दादी-दादा ,चाची -चाचा के पास रहने लगा ।लाइफ ठीक-ठाक सी चल रही थी।दादी -दादा के प्यार से वो थोड़ा संभल रहा था।कुछ साल बीते और बालक पर एक और मुसीबत आ पड़ी । इस बालक की दादी का निधन हो गया जो इसका बहुत ध्यान रखती थी । बालक फिर से टूट गया क्योंकि दादा जी तो खुद ही सदमे में थे। बच्चा अब खुद को एकदम अकेला ,टूटा हुआ महसूस कर रहा था । चाचा का अपना परिवार है और वैसे भी ये तो सभी जानते हैं की अपने सगे माँ-बाप जैसा प्यार और कोई रिश्ता कहाँ दे पाता है लेकिन ये बच्चा तो यहाँ भी अभागा ही रहा इसके खुद के माँ-बाप का प्यार ही इसे नहीं मिल रहा था. पूरी सच्चाई जाने क्या है लेकिन कोई भी माँ -बाप इतने क्रूर नहीं हो सकते कि उन्हें अपने बच्चे का दर्द ,उसके आँसू की कोई परवाह न हो । उनमे अपने बच्चे से मिलने की तड़प न हो । उसकी जरूरतों का ध्यान न हो । पिता को तो एक मिनिट के लिए कठोर मान भी लेते हैं चलो मग़र एक माँ का हृदय इतना कठोर ,इतना भावनाशून्य कैसे हो सकता है। अपनी सगी संतान के प्रति ऐसी क्रूरता ,ऐसी लापरवाही अविश्वसनीय है । मगर ये कलयुग का कटु सत्य है । आज ये बच्चा अपने चाचा-चाची और दादा जी के साथ रह कर भी एकदम अकेला और मज़बूर सा है। ये इतना टूट चूका है कि अपने जीवन के प्रति भी इसका मोह ख़त्म गया है। वो अपने दोस्तों से ऐसी निराशाजनक बातें करता है जैसे उसके लिए ज़िन्दगी का कोई अर्थ नहीं है ।वो अपने गिने -चुने दोस्तों के अलावा किसी को कोई बात भी नहीं बताना पसंद करता है । वो हर राज़ को दिल में दफ़न रखना चाहता है । वो किसी से आसानी से अपने दुःख बाँटना नहीं चाहता है ।वो सब कुछ सहन करके खुद में ही घुटता रहता है ।सोचना किसे होगा हमे ,उसके चाचा-चाची व दादा जी या उसके जन्मदाता माँ-बाप को । ...... ????

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
allowed