न जाने क्यों कुछ बूढ़े अपने सफ़ेद बालों पर काला रंग चढ़ा लेते हैं। मुझे तो सफ़ेद बालों वाले ,गालों पर झुर्रियाँ पड़े हुए और बोबली(बिना दाँत वाली) हंसी वाले बुज़ुर्ग बड़े ही अच्छे लगते हैं । उम्र और अनुभव की परिपक्वता उनके व्यक्तित्व को और भी समृद्ध बना देती है । उनकी निश्छल ,बोबली मुस्कान बहुत ही आकर्षक लगने लगती है । लेकिन आजकल बुज़ुर्ग भी अपने को जवां दिखाए रखने के लिए सभी तरह के प्रयास करते हैं । वो बूढ़े होते हुए भी स्वयं को बूढ़ा कहलवाना पसंद नहीं करते है और कभी -कभी अपरिपक्व व्यक्ति जैसा व्यवहार कर बैठते हैं । सच्चाई तो ये है कि जब इंसान बूढ़ा होता है तो उसकी मानसिक परिपक्वता ही बच्चों को सुख और सुरक्षा का वातावरण प्रदान करती है । बच्चे बुज़ुर्गों के सानिद्धय में स्वयं को सुरक्षित महसूस करते हैं । वो बुजुर्ग जो बच्चों को प्यारी -प्यारी कहानी सुनाते हैं ,धार्मिक ज्ञानवर्धक कथाएँ सुनाते हैं । बच्चों को अच्छे संस्कार प्रदान करते हैं ऐसे बुज़ुर्गों के लिए दिल में स्वतः ही सम्मान पैदा हो जाता है । कुछ बुज़ुर्ग बस सम्मान पाने की ही इच्छा रखते हैं और बच्चों के प्रति या अपने परिवार के प्रति अपने दायित्व को लेकर एकदम बेपरवाह होते हैं । उनके व्यवहार में न ही बुज़ुर्गों वाली समझदारी होती है न सादगी। ऐसे बुज़ुर्गों के प्रति सम्मान के भाव ला पाना बड़ा मुश्किल हो जाता है । इसलिए बुजुर्गों को सादगी पूर्ण और दिखावे रहित व्यवहार को ही ग्रहण करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से उन्हें सम्पूर्ण सम्मान और सत्कार मिलेगा । बृद्धावस्था में इंसान को सांसारिकता से थोड़ा मोह कम करके विरक्ति की तरफ झुकते हुए सादगीपूर्ण और निर्लिप्त और निश्छल व्यवहार को अपनाना चाहिए ।
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