कितनी अज़ीब बात है कि कई बार हमें किसी सही चीज़ को अपनाने में शर्मिंदगी होती है और ग़लत में सहज महसूस करते हैं । ये बात आपको विचित्र लग रही होगी परन्तु ये पूर्ण रूपेण सत्य है ।मैं बात कर रही हूँ अपनी बोलचाल की । देखिए हमारी भाषा '-मैं नी जारी 'मतलब' मैं नहीं जा रही । लेकिन 'जारी' का मतलब तो होता है लगातार या लागू करना । बारिश जारी है । नया नियम जारी किया है । लेकिन हम प्रथम वाले वाक्य में ही ज़्यादा कम्फ़र्टेबल महसूस करते है । ऐसे ही' मैं आ री हूँ 'यानि मैं आ रही हूँ ,लेकिन प्रथम वाले का अर्थ हुआ मैं आरी हूँ मतलब पेड़ काटने का एक हथियार । अब कुछ नाम लेते हैं जैसे धर्मेन्द्र सही शब्द है लेकिन इसका उच्चारण किया जाता है धरमेंदर ऐसे ही और भी कई नाम है जिन्हें हम ग़लत बोलने का अभ्यास कर चुके हैं जैसे राजेन्द्र ,नरेन्द्र आदि प्रभात को परभात उज्ज्वल को उजबल। अब इन्ही नामों को शुद्ध रूप में बोलना मतलब स्वयं को हँसी का पात्र बनाना । तो छोडिए और अपना ग़लत अभ्यास जारी रखिए क्योंकि यहाँ सही में बड़े ख़तरे हैं । जारी रखें ... ....भैया ये आदत सुधार ली तो दुनिया जीने नहीं देगी ।
मनुष्य हो तो मनुष्य बन रहो
मृत्यु के भय से अगर सही को सही और गलत को गलत ना कह सको,तो सन्देह करो अपने मनुष्य होने पर . शक्तिशाली हो कर अगर किसी निर्बल की शक्ति न बन सको,तो संदेह करो अपने शक्तिशाली होने पर. संपन्न हो कर अगर मदद ना कर सको किसी निर्धन की,तो सन्देह करो अपनी सम्पन्नता पर . पुरुष हो कर अगर किसी नारी के सम्मान की रक्षा न कर सको,तो संदेह करो अपने पौरुष पर। धार्मिक हो कर भी अगर धर्म की रक्षा न कर सको, तो धिक्कार तुम्हारे धार्मिक होने पर. मनुष्य हो तो मनुष्य बन रहो इस धरा पर, सिर्फ देह मनुष्य की होना ही मनुष्यता नहीं, समझो इस ध्येय को तो इंसान हो तुम ना समझो तो चारा चर रहो कही। -
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
allowed