आय दिन बढ़ती रेप की घटनाओं ने मन को उद्द्वेलित कर दिया है समझ नहीं आता कि इस तरह कि मानसिकता वाले लोग बढ़ते क्यों जा रहे हैं । ऐसी कुंठित मानसिकता के लिए आख़िर कौन से कारक उत्तरदायी हैं । या तो इस तरह की मानसिकता वाले लोगों की परवरिश में ही कुछ कमी है या इन्हें सही संस्कार नहीं मिले हैं , मानसिक रूप से कुंठित हैं ,या फिर पारिवारिक माहौल ही अपराधिक वृत्तियां बढ़ाने वाला है । जो भी हो लेकिन यदि एक इंसान के रूप में तुम जन्मे हो तो सही गलत में फर्क करके सही निर्णय लेने की बुद्धि तो ईश्वर ने तुम्हें दी ही है । विचारणीय तथ्य तो ये है कि इस तरह के अपराध करने के बाद इन लोगों में कोई पश्चाताप या ग्लानि की भावना नहीं दिखाई देती । ना ही कोई अपराध बोध होता है । बेरहमी से किसी की हत्या करना या अनुचित कृत्य करना ,ये सब पैशाचिक लक्षण हैं जो इस तरह के लोगो के मनुष्य होने पर प्रश्न- चिन्ह लगा देते हैं । क्या पुरुष होने का अर्थ औरत पर शक्ति -प्रदर्शन करना और उसे वासना-पूर्ण नज़रों से देखना ही होता है ,कदापि नहीं । हर अनजान महिला के प्रति पुरुष की सोच कुंठित और वासनामय ही क्यों होती है । क्यों हम उनमें अपनी बहन ,माँ, बेटी की झलक नहीं देखते । काश के हम अपनी नज़रों में पवित्रता रख कर, इनको सम्मान भरी निगाहों से देखना सीख लें तो किसी मार्ग पर कोई असहाय ,लाचार ,पीड़ित निर्भया तड़पती ना मिले । क्या इंसान अपनी इन्द्रियों का इस क़दर ग़ुलाम हो गया है कि उसे किसी भी ग़लत कृत्य का अहसास ही नहीं होता । अपनी इन्द्रियों के वशीभूत होकर वो किसी के प्राण लेने में भी कोई संकोच नहीं करता । लानत है ऐसे इन्द्रियों के ग़ुलाम पुरुषों पर । यदि इस तरह के कृत्यों के लिए ही मनुष्य जन्म लिया है तो ऐसी मानसिकता वाले लोगों को पशु जन्म लेना चाहिए क्योंकि उनमे तो विवेक नहीं होता हैं । लेकिन इंसान विवेकशील हो कर भी इस तरह के कृत्य करता है तो प्रभु कभी माफ़ नहीं करते ।
मनुष्य हो तो मनुष्य बन रहो
मृत्यु के भय से अगर सही को सही और गलत को गलत ना कह सको,तो सन्देह करो अपने मनुष्य होने पर . शक्तिशाली हो कर अगर किसी निर्बल की शक्ति न बन सको,तो संदेह करो अपने शक्तिशाली होने पर. संपन्न हो कर अगर मदद ना कर सको किसी निर्धन की,तो सन्देह करो अपनी सम्पन्नता पर . पुरुष हो कर अगर किसी नारी के सम्मान की रक्षा न कर सको,तो संदेह करो अपने पौरुष पर। धार्मिक हो कर भी अगर धर्म की रक्षा न कर सको, तो धिक्कार तुम्हारे धार्मिक होने पर. मनुष्य हो तो मनुष्य बन रहो इस धरा पर, सिर्फ देह मनुष्य की होना ही मनुष्यता नहीं, समझो इस ध्येय को तो इंसान हो तुम ना समझो तो चारा चर रहो कही। -
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