'निम्न से ही उच्च है "







रुतवा और प्रतिष्ठा का अर्थ कभी भी व्यक्तिगत या सीमित मायनो में नहीं लिया जा सकता । ये व्यक्तिगत या एकात्मक तौर पर अर्थहीन हैं । इन्हें अपना अस्तित्व पाने के लिए पराश्रित होना पड़ता है । इस वाक्य का अर्थ ये है कि इंसान प्रसिद्ध होने के लिए, सम्मान पाने के लिए  किसी दूसरे व्यक्ति या समूह विशेष पर निर्भर करता है । 

इंसान अपने आप में कितना ही गुणी या प्रतिभावान क्यों न हो जब तक उसकी प्रतिभा की कद्र करने वाले ,उसके गुणों को पहचानने वाले या स्वीकार करने वाले लोग नहीं होंगे वह व्यक्ति प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं कर पाएगा । इसलिए इस सम्मान को पाने के लिए हमें अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन के  साथ-साथ दूसरों को प्रभावित करना ,उनके विचारों को समझना और उनकी प्रतिक्रियाओं को सकारात्मक आधार भी प्रदान करना होता है । 

हर  इंसान अपना रुतवा पाने के लिए ,अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए, उसे सिद्ध करने के लिए दूसरों पर निर्भर है । ये दूसरे की सोच है , उसका  अपना निर्णय है कि वह आपको प्रतिभावान मानता है या नहीं । वो आपमें सब कुछ होते हुए भी आपका सम्मान करता है या नहीं । यदि आपकी प्रतिभा को किसी भी कारण वश वह नकारता है तो आपको संघर्ष करना ही पड़ेगा । किसी प्रतियोगिता के निर्णय हेतु निर्णायकों द्वारा  जनता का मत लेना भी इसी का एक उदाहरण है । 

यहाँ प्रतिभा की सफलता और उसकी प्रतिष्ठा जनता के वोटों पर निर्भर करती है । ठीक उसी तरह कितने बड़े फ़िल्म कलाकार ,गायक ,निर्देशक सभी की प्रतिष्ठा जनता के हाथों में हैं । जनता की पॉज़िटिव सोच ,जनता के प्यार और प्रशंसा की वजह से इन्होंने प्रतिष्ठा या रुतवा पाया हुआ है ।

 इसलिए यदि तुम्हे समाज में प्रतिष्ठा ,सम्मान मिले हुए हैं तो ईश्वर और उन लोगों को कभी मत भूलिए जिनकी वजह से अपने ये सब अर्जित किया हुआ है । आपके सम्मान में झुकने वाले  उस व्यक्ति की अहमियत ,उसका उपकार कभी ना भूलें जो खुद झुक कर आपको ऊँचा उठा देता है ।


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