कुछ अलग सा रोमांच है इस सर्दी के मौसम में ।ये मौसम मुझे बहुत अच्छा लगता है और मेरा ये मानना है कि अधिकतर लोगों को ये सर्द मौसम बहुत अच्छा लगता होगा । सर्दी के मौसम में एक अजीब सी उमंग ,एक उत्साह सा दिल में आ जाता है । मन जैसे उड़ने सा लगता है । गुनगुनी धूप में घंटों तक बिना किसी अवरोध के बैठे रहना एक सुखद अनुभव लगता है फिर चाहे शकल पर १२ बजे या १ , धूप सेकने का मोह कम नहीं होता । त्वचा की सुरक्षा के तौर पर संस्क्रीन लोशन लगा लिया जाता है बाकी सब सूर्य देव जी संभाल लेते हैं । मगर इस मौसम में सबसे कष्टदायक होता है रजाई छोड़कर बाहर आना ,जी करता हैं "कैटर पिलर ' बनकर ही पड़े रहे लेकिन इससे कुछ हासिल नहीं होने वाला ये सोचकर तमाम मोटिवेशनल स्पीकर की स्पीच याद की जाती है । संस्कृत के श्लोक दोहराए जाते हैं मगर सब व्यर्थ । अब जैसे -तैसे करके बन्दा उठ भी जाए तो अब उसको 'स्नान"जैसी प्रताड़ना को झेलने के लिए तैयार होना पड़ता है । वैसे इस मौसम का फायदा उठाते हुए कई लोग सब को उल्लू भी बना देते हैं । कुछ लोग बाथरूम में घुस तो जाते हैं मग़र बिना नहाए ही कपड़ों पर परफ्यूम लगाकर ऐसे बाहर आते हैं जैसे शाही स्नान करके बाहर निकले हों । खैर छोड़ो लोगों की कोई भी स्थिति हो मगर हम तो रोज़ नहाते हैं क्योंकि धूप खाने का मज़ा तो तभी मिलता है । अब गरमा-गरम पकौड़े,गज़क ,मूँगफली गर्मी में सड़कों पर ऐसी रौनक कहा मिलती है । गर्मी की धूप में तो सड़कें सूनसान ,आंधी-तूफ़ान ,लुएं बस ये ही देखने को मिलते हैं । सर्दी में रजाई में बैठकर चाए -कॉफ़ी पीना, टीवी प्रोग्राम देखना या कुछ पढ़ना बहुत अच्छा लगता है । सर्दी की धूप में किसी फूलों के बग़ीचे में बैठना बहुत ही सुकून भरा अनुभव होता है । सर्दी में यदि जल्दी उठने का साहस कर लिया जाए तो सर्दी एक बहुत बड़े उत्सव से कम नहीं है । तो सर्दी का भरपूर मज़ा लें और उत्साहित रहें । हैप्पी सर्दी ।
मनुष्य हो तो मनुष्य बन रहो
मृत्यु के भय से अगर सही को सही और गलत को गलत ना कह सको,तो सन्देह करो अपने मनुष्य होने पर . शक्तिशाली हो कर अगर किसी निर्बल की शक्ति न बन सको,तो संदेह करो अपने शक्तिशाली होने पर. संपन्न हो कर अगर मदद ना कर सको किसी निर्धन की,तो सन्देह करो अपनी सम्पन्नता पर . पुरुष हो कर अगर किसी नारी के सम्मान की रक्षा न कर सको,तो संदेह करो अपने पौरुष पर। धार्मिक हो कर भी अगर धर्म की रक्षा न कर सको, तो धिक्कार तुम्हारे धार्मिक होने पर. मनुष्य हो तो मनुष्य बन रहो इस धरा पर, सिर्फ देह मनुष्य की होना ही मनुष्यता नहीं, समझो इस ध्येय को तो इंसान हो तुम ना समझो तो चारा चर रहो कही। -
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