आप मुझे निर्दिष्ट करो





ये मेरे सपनों की उड़ान और गर्द -गुबार  वाले इस मौसम की गुस्ताखी ,अब हौसलों का सहारा लेकर पहुचूंगी उस 

दुनिया में ।तब  जाकर कहूँगी  उस सृजक से कि मै अपना लक्ष्य भूल आई हूँ,तो अब आप मुझे निर्दिष्ट करो कि अब 

मै किस दिशा को जाऊं। किस मार्ग को चुनूँ कि मेरा हर भटकाव (सांसारिकता का) ख़त्म हो जाये और मै उस जीत को अर्जित कर 

लूं जिसके ख्वाब मुझे रातों को सोने नहीं देते । मै एक विश्वास  उससे पाना चाहती हूँ कि वो कह दे अब तुम्हारी 

मंजिल दूर नहीं । 

अब तुम्हारी हर उड़ान को मै अपने नियंत्रण में रखूंगा और तुम्हारे सपनों को दिशा विहीन नहीं होने दूंगा।

बस फिर मैं अपनी मंज़िल पा लूँगी और उसे अपना  पथप्रदर्शक बनाकर अपना जीवन आलोकित कर लूँगी। 

 


  


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