नैतिकताबद्ध हो 'प्रेम '
प्रेम के बारे में लोगों के अपने अलग-अलग विचार हैं । कुछ लोगों का ये मानना है कि प्यार में नैतिक -अनैतिक कुछ नहीं होता । प्यार में ऐसी कोई चीज़ मायने नहीं रखती,तो जो भी व्यक्ति ऐसा सोचते हैं ये बिल्कुल ग़लत सोच है। दरअसल नैतिकता ही प्यार का स्वरूप निर्धारित करती है । रिश्तों के अनुरूप व्यवहार करना भी हमें नैतिकता ही सिखाती है । प्यार तो हम सभी से करते हैं ,चाहे वो माँ -बाप ,भाई ,बहन ,पति ,बेटा , दोस्त या कोई भी हो लेकिन इनके प्रति हमारे प्रेम का स्वरूप अलग -अलग होता है जो हमारे अंदर की नैतिकता से संचालित होता हैं ।
नैतिकता ही हमें ये समझाती है कि प्रेम वास्तव में किसी को ख़ुशी देना है । उसे खुश या उन्नति करते हुए देखना है । किसी को दुःख पहुँचाने की इच्छा रखना ,बदला लेने की मंशा रखना प्यार नहीं है। नैतिक मर्यादाओं का अहसास यदि व्यक्ति को नहीं होगा तो वो अपनी पसंद के किसी भी व्यक्ति को अनैतिक तरीके से या बलात हासिल करने से परहेज़ नहीं करेगा । अपनी ख़ुशी,हठ या अहम् के लिए किसी को उसकी इच्छा के विरूद्ध अपनाना प्यार नहीं' विकृत भावना है ।
युद्ध या प्यार के सन्दर्भ में अक्सर हम अंग्रेजी की ये कहावत उपयोग में लेते हैं --'एव्री थिंग इज़ फेयर इन लव एंड वॉर 'लेकिन क्या ये सही है? यदि हाँ तो प्यार के लिए किसी की हत्या ,रेप ,चोरी ,और ऐसे ही अन्य कई अपराध सब कुछ ही वैध हैं । फिर क्यों इनका विरोध होता है । पहले तो इस तरह की कहावतों का भरपूर उपयोग बिना-सोचे समझे जीवन में किया जाता है और फिर जब कोई इसके अनुरूप व्यवहार शुरू कर देता है तो उसके लिए सज़ाएँ घोषित कर दी जाती हैं इसलिए ज़रूरी है कि नैतिकता की अहमियत को समझा जाए ।
नैतिक मर्यादा का पालन हर समय और हर रिश्ते में किया जाए अन्यथा 'प्यार' सिर्फ एक अंधा मोह या विकृति मात्र बनकर रह जायेगा । नैतिकता ही हर रिश्ते को प्यार के सही रूप और मर्यादा का ज्ञान कराती है । नैतिकता विहीन प्यार कभी मर्यादित नहीं होता और मर्यादा विहीन प्यार सिर्फ़ वासना है । जिस तरह हर रिश्ते की अपनी मर्यादाएँ होती हैं वैसे ही प्यार के लिए नैतिक प्रतिबद्धताएँ ज़रूरी हैं । प्यार हमें समर्पित होना सिखाता है ,किसी के लिए त्याग करना सिखाता है न कि अपनी ख़ुशी के लिए किसी दूसरे को मिटाना या हानि पहुँचाना । प्रेम गुलाब की तरह सदैव पवित्र और नैतिकता की सुगंध से युक्त होना चाहिए । वासना युक्त प्रेम कभी श्रेष्ठ नहीं होता। जो प्रेम आत्मिक हो ,हर परस्थिति में बना रहे ,जिसमें शरीर की नहीं आत्मा की बात हो वही शुद्ध है । वास्तविक अर्थ में 'प्रेम' एक पवित्र शब्द है जिसका मलिन बुद्धि वालों ने अपवित्र अर्थ कर दिया है। पवित्र प्रेम किसी से भी करना ग़लत नहीं है मगर वासना युक्त और शरीर पर केंद्रित कोई भी प्रेम वास्तविकता में प्रेम न होकर मानसिक गंदगी है जो एक अपराध है. ईश्वर व्यक्ति के भावों को देखकर ही पाप पुण्य का निर्धारण करते हैं। शुद्ध भाव से किया गया कोई भी कर्म सांसारिक लोगों की नज़र में ग़लत होते हुए भी भगवान की नज़रों में पवित्र ही है और अगर भावों में गंदगी है तो सांसारिक लोगों की नज़रों में ऊपर से पवित्र दिखने वाला कर्म भी ईश्वर की दृष्टि में अपवित्र ही है इसलिए सांसारिक लोगों की दृष्टि में ऊपर उठने की नहीं वरन ईश्वर की दृष्टि में ऊपर उठने के लिए कर्म कीजिए। सांसारिक लोगों से प्यार ,सम्मान ,सहानुभूति प्राप्त करने के लिए ईश्वर की उपेक्षा न करें बल्कि ईश्वरीय शक्ति के सम्मान हेतु सांसारिक लोगों के ग़लत निर्णय को चुनौती दीजिए। यही मानवता है यही सच्चा प्रेम है ईश्वर और मनुष्य जाति के प्रति।

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