आधुनिक नारी
नारी तेरी दीन दशा पर ,प्रकृति भी रोने लगी है
उत्कृष्ट कृति श्रृष्टि की तेरी पहचान खोने लगी है।
कभी दोषी रहा पुरुषत्व ,कहीं तेरी चेष्टाएं हो रही हैं
जन्म दात्री '.आज विलुप्त तेरी ,निष्ठाएं हो रही हैं .
प्रणय का निवेदन है पर ,विवाह की अस्वीकृति है
उत्सर्ग भी बना अब तो ,विवशता की अनुकृति है फूल सी कोमल '.
क्रूर क्यों होने लगी है ,
पावन छवि अपनी खुद ही धोने लगी है।
दुग्ध -पान अंक में करा ,सर्प-दंश पालती है
संस्कार हीन बना पुत्र को ,अंध -गर्त में डालती है
लक्ष्य हीन तेरे पथ की ,दिशाएं होने लगीं हैं
उच्छ्रिङ्खल्ता की तुझ में निशाएँ सोने लगीं हैं ।
उत्कृष्ट कृति श्रृष्टि की तेरी पहचान खोने लगी है।
कभी दोषी रहा पुरुषत्व ,कहीं तेरी चेष्टाएं हो रही हैं
जन्म दात्री '.आज विलुप्त तेरी ,निष्ठाएं हो रही हैं .
प्रणय का निवेदन है पर ,विवाह की अस्वीकृति है
उत्सर्ग भी बना अब तो ,विवशता की अनुकृति है फूल सी कोमल '.
क्रूर क्यों होने लगी है ,
पावन छवि अपनी खुद ही धोने लगी है।
दुग्ध -पान अंक में करा ,सर्प-दंश पालती है
संस्कार हीन बना पुत्र को ,अंध -गर्त में डालती है
लक्ष्य हीन तेरे पथ की ,दिशाएं होने लगीं हैं
उच्छ्रिङ्खल्ता की तुझ में निशाएँ सोने लगीं हैं ।
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