त्यौहारों का उद्देश्य
त्यौहार आते हैं, चले जाते हैं लेकिन इनको मनाने के पीछे जो उद्देश्य है वो हर बार ही कहीं नज़र नहीं आता । दशहरा आता है -सड़कों पर , मैदान में ,हर घर के बाहर तमाम रावणों के पुतले बना कर रख दिए जाते हैं ।पठाखे -बारूद भर कर इन्हें जला दिया जाता है लेकिन वास्तविकता में कोई रावण नहीं मरता । बुराईयां ख़त्म नहीं होती । हज़ारों रावण बेख़ौफ़ समाज में घूमते हैं क्योंकि वास्तविकता में राम जैसे गुण ही किसी व्यक्ति में नही मिलते जो इन रावणों का वध कर सके .इसलिए इस त्यौहार का जो असली उद्देश्य रावण रुपी बुराईयों को ख़त्म करना, कहीं खो जाता है ।
दीपावली आती है ,लोग पटाखों पर अनावश्यक रूपये बर्बाद करते हैं । पटाखों के रूप में तमाम रुपए जला दिए जाते हैं । भरपूर ध्वनि-प्रदूषण और वायु -प्रदूषण किया जाता है । लोगों के स्वास्थ्य के साथ जम कर खिलवाड़ किया जाता है ।
पटाख़ों पर जितने रूपए बर्बाद किए जाते हैं उनमें कितने ही ग़रीबों के घरों में रौशनी और खाने की व्यवस्था की जा सकती है ,उनके चेहरों पर खुशियां लाई जा सकती हैं लेकिन नहीं तेज़ आवाज़ वाले पटाख़े और ऐसा ही अनावश्यक सामान ज़्यादा ज़रूरी है ना ।
'होली 'रंगों का खुशियों का ,पारस्परिक सौहार्द का त्यौहार है लेकिन इसका स्वरूप तो आजकल बहुत ही ख़तरनाक हो चुका है । कीचड़ ,हानिकारक रंग या जो भी चीज़ हाथ में आई उसी को किसी के ऊपर फेंक देना,बिना परवाह के किसी की भी आँख आदि में रंग डाल देना ये सब कितनी घटिया हरक़तें हैं । फिर ''बुरा न मानो होली है''कह कर अपनी हर ग़लती को वैध ठहरा देना और भी यातना- दायक कृत्य लगता है । पानी की बेहद बर्बादी ,त्वचा को नुकसान ,बालों की दुर्दशा ,काले -पीले रंगों से खऱाब हुई दीवारें व आँगन और भांग पीकर गाली-गलौच व मारपीट करते युवक ।
क्या ये ही सही तरीका और सही उद्देश्य है होली खेलने का ?
होली त्यौहार का अर्थ है -पारस्परिक प्रेम,स्नेह की भावना और शत्रु- क्षमा की भावना आदि का प्रसार लोगों में करना लेकिन इस दिन जितने झग़डे और मारपीट होती हैं वो और दिन की अपेक्षा कहीं ज़्यादा होते हैं ।
जोधपुर में एक ऐसी ही घटना होली पर कुछ साल पहले हुई थी।
ऐसे ही मकर संक्रांति को पतंग उड़ाने का दिन बना लिया गया है .सुबह उठते ही पहले बिना नहाये धोये छत पर चढ़ कर पतंग उड़ाना और फूहड़ गाने चला देना, नहा कर दान पुण्य की तरफ किसी का कोई खास ध्यान ही नहीं होता है।
इससे कहा जा सकता है कि त्यौहार बस अब एक औपचारिकता मात्र है इनके पीछे छुपे उद्देश्य से अब किसी का कोई लेना-देना नहीं है या कोई मतलब ही नहीं रखना चाहता है । सच्चाई तो ये है कि हर त्यौहार का उद्देश्य समाज और संस्कृति में नैतिक श्रेष्ठता ,पारस्परिक सद्भाव,और प्रेम का विकास ही रहा था जिसे हम सब भूल चुके हैं.

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