आज महिला दिवस के अवसर पर मैं एक ऐसी सशक्त महिला को याद करना चाहूँगी जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अपना महत्वपूर्ण योग दान दिया था । लेकिन शायद कम लोग ही उनसे परिचित हैं । उनका व्यक्तित्व मुझे बहुत प्रभावित करता है । जिनकी तस्वीर में ही इतना आकर्षण हो ,जो मन को एक साहस और प्रेरणा प्रदान करती हो, वो वास्तविकता में कितनी प्रभावशील रही होंगी । मैं बात कर रही हूँ कैप्टन लक्ष्मी सहगल जी की । कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने न केवल भारत की आज़ादी के लिए लड़ाई लड़ी बल्कि स्वतंत्र भारत में भी समाज सेवा में ६५ साल सक्रियता दिखाई । २४ अक्टूबर १९१४ में इस वीरांगना का जन्म एक कुलीन ब्राम्हण परिवार में हुआ था । इनके पिता एस० स्वामीनाथन मद्रास हाईकोर्ट में जाने -माने वकील थे । वो एक धार्मिक व्यक्ति थे । इनकी माता अम्मुकुट्टी भी एक सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता थीं । इसका प्रभाव लक्ष्मी जी पर भी पड़ा । लक्ष्मी जी के माता-पिता इन्हें डॉक्टर बनाना चाहते थे । इसलिए इन्होंने मद्रास मेडिकल कॉलेज़ से मेडिकल की डिग्री ली । इन्होंने अपना सम्पूर्ण चिकित्सकीय ज्ञान गरीबों की सेवा व उपचार में लगा दिया । 1940 में इन्हें सिंगापुर के प्रवासी भारतीय मज़दूरों की जानकारी मिली तो ये उनकी सेवा के लिए सिंगापुर चली गईं ।वहाँ सुभाष चंद्र बोस ने 'आज़ाद हिन्द फ़ौज' की महिला रेजीमेंट की स्थापना की थी । इस रेजिमेंट का नाम था'रानी झाँसी रेजिमेंट' । इनके हाथ में ३०३ रायफल देखकर सुभाष चंद्र इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इन्हें इस रेजिमेंट का कैप्टन बना दिया । देश के लिए ये जेल भी गईं । १९४७ में इन्होंने पी० के० सहगल से विवाह किया तभी से इनके नाम के साथ सहगल जुड़ा । सहगल जी भी 'आज़ाद हिन्द फ़ौज़'में कर्नल थे । शादी के बाद ये कानपुर आ गई और यहाँ उन्होंने गरीबों और शरणार्थियों की निःशुल्क सेवा की । १९७१ में भारत-पाक युद्ध के दौरान घायल सैनिकों की भरपूर सेवा की । 1998 में इन्हें पद्म -विभूषण से सम्मानित किया गया था । २३जुलाई २०१२ में कानपुर में इनका देहांत हो गया । इनके अदम्य साहस को हम नमन करते हैं ।
मनुष्य हो तो मनुष्य बन रहो
मृत्यु के भय से अगर सही को सही और गलत को गलत ना कह सको,तो सन्देह करो अपने मनुष्य होने पर . शक्तिशाली हो कर अगर किसी निर्बल की शक्ति न बन सको,तो संदेह करो अपने शक्तिशाली होने पर. संपन्न हो कर अगर मदद ना कर सको किसी निर्धन की,तो सन्देह करो अपनी सम्पन्नता पर . पुरुष हो कर अगर किसी नारी के सम्मान की रक्षा न कर सको,तो संदेह करो अपने पौरुष पर। धार्मिक हो कर भी अगर धर्म की रक्षा न कर सको, तो धिक्कार तुम्हारे धार्मिक होने पर. मनुष्य हो तो मनुष्य बन रहो इस धरा पर, सिर्फ देह मनुष्य की होना ही मनुष्यता नहीं, समझो इस ध्येय को तो इंसान हो तुम ना समझो तो चारा चर रहो कही। -

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