'सबका धर्म मानवता '


 
धार्मिक सद्भावना देश की एकता और मानवता को जीवित रखने के लिए बहुत जरूरी है ।  यदि ये बात सभी लोगों की समझ में अच्छे से आ जाए तो  न तो धार्मिक मतभेद ही पैदा होंगे और न  ही इस आधार पर देश का विभाजन होगा । सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता रखना  बहुत ही आवश्यक है । अपने -अपने धर्म की प्रतिष्ठा और श्रेष्ठता प्रतिपादित करना एक तुच्छ सोच है । हमारी संस्कृति, हम सभी के धर्म -ग्रन्थ, हमे एक ही शिक्षा देते है और वो है -भाईचारा ,एकता ,सहिष्णुता और सद्भाव । अत: अपने -अपने धर्म की उच्चता को सिद्ध करके परस्पर झगड़े करना ग़लत बृत्ति है। प्रभु ने किसी धर्म विशेष की रचना नहीं की । ये सब मनुष्य द्वारा स्थापित किए गए वैचारिक मतभेदों का नतीज़ा है । ईश्वर ने तो सिर्फ़' मानवता ' धर्म की ही रचना की है ।' यदि ईश्वर ने  धर्म अलग-अलग बनाए होते तो सबकी शारीरिक रचना भी भगवान सब धर्मों के हिसाब से अलग-अलग बनाते । लेकिन प्रभु ने सभी को एक जैसा बनाया है । सभी में एक जैसा रक्त बहता है । सभी की शारीरिक संरचना एक ही तरह से की है । अगर वेश-भूषा  सभी की एक  ही कर दी जाए तो कोई मनुष्य ये नहीं बता सकता कि अमुक मनुष्य हिन्दू है ,सिख है या ईसाई है । इसलिए हमे बस' मानवता 'धर्म को याद रखना चाहिए । और धार्मिक आधार पर द्वेष भाव या वैमनस्य नहीं पालना चाहिए  । धार्मिक मतभेद संकीर्ण मानसिकता के परिचायक हैं क्योंकि महान पुरुषों में तो 'वसुधैव कुटुम्बकं 'की भावना होती है अर्थात उनके लिए सारी दुनिया ही परिवार की तरह होती है । स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि अगर कोई धर्मावलंबी ये सोचता है की उसी का धर्म सर्व श्रेष्ठ है उसी का विस्तार हो और दूसरे धर्मों का नाश हो तो ऐसे लोगों  के लिए मानव सभ्यता में कोई स्थान नहीं होना चाहिए । सभी धर्म-ग्रंथों का एक ही सार है कि परस्पर सहयोग से रहे न की एक दूसरे में फूट डालें । 














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