ग़र तेरी रहमत होती
मुक़द्दर की बेबसी पर हँसता है ज़माना
काश के हाथ में तकदीर होती
खजां को भी वसंत बना देती ग़रख़ुदा तेरी थोड़ी सी इनायत होती
आसताँ पे तेरी जो झुकाती थी सर
इस तरहा काफ़िर न होती
तुझको जो क़ुबूल उसकी इवादत होती
आशियां उसका इस तरहा ना उजड़ता कभी
मिली उसको जो तेरी रहमत होती ।
-तस्वीर साभार गूगल
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