'घूँघट'








 
नारी की समाज में स्थिति को लेकर एक 
एक विचार नहीं रखा जा सकता ।समाज में उसकी स्थिति में  हर वक़्त परिवर्तन आते रहे हैं ।वैदिक काल और मध्यकाल की स्थिति से लेकर आज आधुनिक युग तक ये परिवर्तन जारी हैं ।

आज उसकी  समाज में स्थिति पहले की अपेक्षा सुधरी है लेकिन पूरी तरह नहीं ।पर्दा-प्रथा को ही ले लीजिए।मध्यकाल में स्त्री-जाति,पर्दा-प्रथा से सबसे ज़्यादा त्रस्तथी।मुगलों के शासन काल,सामंती व्यवस्था और विदेशी आक्रमण की वज़ह से स्त्रियों को घर में ही रहने की सलाह व चेतावनी दी जाती थी।विलासी-राजाओं की बुरी दृष्टि से बचाने के लिए शायद इस प्रथा की शुरुआत की गई थी लेकिन आज भी ये प्रथा ग्रामीण क्षेत्रों और परंपरावादी परिवारों में अपनी पैठ जमाए हुए है।यहाँ तक कि कहीं-कहीं तो पढ़े-लिखे परिवार भी इस प्रथा को बड़ी ही शिद्दत से निभा रहे हैं ।आख़िरकार किसी बुराई को समाज से निकाल कर बाहर करना इतना आसान काम भी तो नहीं है । 
पर्दा-प्रथा या दूसरे शब्दों में'घूँघट'की प्रथा मुझे कभी तार्किक नहीं लगी।औचित्य-हीन ये परम्परा पता नहीं कैसे अपना अस्तित्व बनाए हुए है.

आधुनिक युग में भी कुछ लोगों का मानना है कि घूँघट करने वाली स्त्रियां सभ्य,शालीन और संस्कारित होती हैं ।चाहे वो भीतर ही भीतर इस प्रथा का मानसिक विरोध करती रहें या कुण्डित होती रहें। कुछ के लिए ये मज़बूरी है तो कुछ इसे अपनी नियति मान कर सहती रहती हैं। ससुराल पक्ष में किसी भी समारोह में जाते हुए लंबा सा घूँघट निकालना आज भी कई दुल्हनों की मज़बूरी है।इसी घूँघट के साथ जब उसे फ़ोटो भी खिंचानी पड़ती है तो लगता है मानो किसी खतरनाक अपराधी(फाँसी की सज़ा वाला) की तस्वीर समाचारपत्र के लिए ली जा रही है.
बेचारी महिला को ही क्यों अपना चेहरा छुपाने की ज़रूरत होती है।कुदृष्टि तो पुरुषों की हो और चेहरा महिलाएँ ढकें ?बड़ी विचित्र स्थिति है ।यदि इसका संबंध स्त्री की लाज़,मर्यादा और शालीनता से है तो ये ससुराल में ही क्यों लागू होती है इस हिसाब से तो हर स्थान पर स्त्री को घूँघट में रहना चाहिए ।जब ससुर को पिता का और देवर ,जेठ  को भाई का दर्ज़ा दिया जाता है तो फिर इनसे घूँघट का क्या औचित्य है ?

दूसरी विरोधाभासी चीज़ ये कि  वैसे तो बहुओं से व बेटियों से ये अपेक्षा की जाती है की वो शालीन व्यवहार करें ,स्त्र्योचित गुण व लज्जा रखें लेकिन शादी समारोह या किसी भी संगीत समारोह में उन्हें लाज़ ,शर्म  छोड़कर ,घूँघट को भूल-भालकर नृत्य करने की बेझिझक अनुमति भी  दे दी जाती है। वही घूँघट वाली बहु और बेटी जब बिना घूंघट के झूम -झूम कर किसी भी बेहुदा गाने पर डांस कर रही होती हैं तो इनके ससुर ,देवर ,पिता आदि बड़े शान से इनकी फ़ोटो लेते हैं और गर्व का अनुभव करते हैं तब शालीनता और मर्यादा की इनकी सीख़ कहाँ चली जाती.ऐसी दोहरी मानसिकता से बचें । सभी अपनी सोच बदले और मानसिक मर्यादा पर ज़्यादा ज़ोर दें क्योंकि जब ये विकसित हो जायेगी तो किसी परदे ,घूँघट की ज़रुरत नहीं होगी और सम्पूर्ण व्यवहार ही शालीन हो जायेगा ।
घूँघट तो बाहरी दिखावा है,भीतरी अनुशासन जरूरी है।कोई पहनावा तुम्हें संस्कारित नहीं घोषित कर सकता है जब तक मानसिक दृढ़ता नहीं आती।

 हिंदी साहित्य में पढ़ा कवयित्री महादेवी वर्मा जी का वो वाक़या कभी भी मेरे दिमाग़ से नहीं जाता जिसमें उन्होंने एक गुरु से शिक्षा लेने के लिए  सिर्फ़ इसलिए मना कर दिया था क्योंकि वह  गुरु  उन्हें देखकर मुँह फेर कर बैठ गए थे और महिला होने की वज़ह से उनकी तरफ़ देखकर  बात कर पाने में स्वं की असमर्थता जता रहे थे । महादेवी जी ने क्रोधित होते हुए कहा जो पुरुष मन से इतना कमज़ोर हो वो मुझे क्या ज्ञान दे पाऐगा।आज के परिवेश में महादेवी जी जैसे विचारों को अपनाने की ज़रुरत है ।

आज की स्थिति देखें तो  राजस्थान के  राजपूती परिवार जो कि परम्पराओं और  पर्दा -प्रथा के लिए सबसे ज़्यादा प्रसिद्ध रहे हैं उनमें भी काफी हद  तक सुधार हुआ है  । एक राजस्थानी, राजपूती ससुराल से जुड़े होने के नाते मैंने भी इन परम्पराओं को झेला  है और इनका विरोध भी किया है । मेरे प्रयासों का ये असर हुआ है कि आज मैं अपनी पसंद का कोई भी परिधान जो फ़ूहड़ न हो पहन सकती हूँ । मेरे साथ-साथ परिवार की और बहुएँ भी मेरे इस सुधार या परिवर्तन का लाभ उठा रही हैं । जिन बहुओं को पहले साड़ी के अलावा सूट आदि पहनने की या बिना घूँघट के कही जाने की अनुमति नहीं थी आज वो ये सब कर पा  रही हैं । मुझे हर्ष है कि चाहे मुझे इस सुधार का श्रेय मिले न मिले मग़र अप्रत्यक्ष रूप से मैं ही इसकी अधिकारी हूँ ।मेरी वज़ह से कहीं तो सुधार हुआ है चाहे थोड़ा ही सही ।
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