अपेक्षा करना छोड़ दो
जिंदगी में खुश रहना है तो अपेक्षा करना छोड़ दीजिए । किसी से भी अपने लिए अपेक्षा रखना दुःख का मूल कारण है । मानव का स्वभाव होता है कि वो अगर किसी के लिए कुछ करता है तो बदले में अपने लिए भी फिर उससे तमाम अपेक्षाएं पाल लेता है । अगर वह व्यक्ति उसकी अपेक्षाओं पर खरा उतर जाता है तो संतुष्ट वरना मानसिक अवसाद ,या गिले -शिक़वे शुरू हो जाते हैं । अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि शेक्सपियर ने कहा था ''अधिकतर लोगों के दिलों में दर्द व रिश्ते ख़राब होने का कारण दूसरों से अपेक्षा ही है । परिवर्तन संसार का नियम है इसलिए हमें किसी से अपेक्षाएं नहीं रखनी चाहिये ''। दार्शनिक आचार्य ओशो ने भी कहा है कि'' दुःख अपेक्षाओं के द्वारा ही आते हैं क्योंकि जो घटित होता है वह आशीष होता है ''। इसलिए किसी से भी उम्मीद रखना छोड़ दीजिए । कर्म और दायित्व निभाते जाइए । आप अपने कर्म निष्काम और स्वार्थ रहित भावना से करेंगे तो उनका सकारात्मक परिणाम आपको मिलेगा ही । ऐसा नहीं भी होता है तो अपेक्षा और फल की कामना न रखने की वजह से आपको उसके लिए दुःख तो कम से कम महसूस नहीं होगा । इस पृथ्वी पर अधिकतर प्राणी मोह और अपेक्षा से ग्रसित हैं जैसे माँ -बाप अपनी संतान से अपेक्षा रखते हैं कि उनकी संतान बड़ी होकर उनके बुढ़ापे का सहारा बनेगी । एक गुरु सोचता है कि उसका शिष्य उसका नाम रोशन करेगा । ऐसे ही हर रिश्ता एक -दूसरे से तमाम अपेक्षाएं रखता है । अपेक्षाएं इंसान के द्वारा पैदा की गई वो आकर्षक कोरी कल्पनाएं हैं जिनका वास्तविकता में कोई अर्थ नहीं हैं । जिनको पूरी तरह सत्य मानना एक भ्रम है । हम जो अपेक्षा रखते हैं वो हमेशा पूरी हों ये ज़रूरी नहीं है लेकिन इनके भरोसे रहकर इंसान कर्म करना नहीं छोड़ सकता । उदाहरण के लिए -यदि किसी माँ -बाप को अपनी संतान के बारे में पता चले कि वह बड़ी होकर उसकी सेवा नहीं करने वाली है तो क्या वो माँ -बाप अपनी संतान को बड़ा नहीं करेंगे ,उसे भूखा मार डालेंगे कदापि नहीं । माँ-बाप किसी के कहने से अपनी संतान की परवरिश नहीं करते हैं ।ये उनका दायित्व है इसलिए वो इसे निभाते हैं और उन्हें ये निभाना ही चाहिए । ठीक उसी तरह बच्चों का कर्तव्य है कि बड़े होने पर वो माँ-बाप के प्रति अपने दायित्व व कर्तव्य को समझें और निभाए । लेकिन दोनों को ही बिना किसी अपेक्षा के ये कार्य करना चाहिए अन्यथा दोनों ही दुःखी रहेंगे । क्योंकि अपेक्षाएं सिर्फ़ दुःख ही दे सकती हैं सुख या विश्वास नहीं ।

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