'लफ़्ज़ ज़िंदगी के '(kavita)
ज़िदगी फूल सी भी है ,और काँटो सी भी कभी
दर्द बन के चुभती है तो, सेज़ ख़ुशी की भी है कभी
समंदर में लहरें हैं तो ,साहिल भी है कहीं
ये मरुस्थल का बंजर नज़ारा है तो, हसीं वादियाँ भी हैं कहीं
मत परेशां हो इन आँधियों से अभी ,बारिशों की भीगी शाम भी है कहीं
सहमता है क्यों ग़मों के अंधेरों से प्रखर ,सुखों की सहर भी बाक़ी है अभी
चल पड़ा है जो अकेला ही विजय -पथ के लिए ,काफ़िला साथ आने को बाक़ी है अभी
वो जो चुप सा है तेरे शब्दों में कहीं ,जब भी बोलेगा जम के बोलेगा कभी ॥

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