''होली की शरारत"(kavita)




रंग -बिरंगे त्यौहारों की एक शऱारत होली थी ।

पुत गई अच्छे से वो सूरत जो भी जितनी भोली थी ।

भीगी-भीगी राहें सारी ,शर्मायी सी गौरी थी

प्रियतम संग चुपके-चुपके से, उसने खेली होरी थी ।

गली-मौहल्ले धूम-धड़ाका ,निकली पूरी टोली थी

पिचकारी रंगों की भाषा, खुल कर पूरी बोली थी ।

डरे ,सहमे,दुबके लोगों की ,हिम्मत इसने खोली थी
 
लिपे -पुते थे  रंग में सारे, सब ने की हंसी -ठिठौली थी।

कुछ पक्के रंग थे प्रेम-भाव के ,नफ़रत दिल की मिटा गए

सच कहें तो मतभेदों में समझ बनी बिचौली थी ।।
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