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बुद्धि को सही समय पर सही दिशा दें

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जिसकी बुद्धि मलिन है, मानसिक स्वास्थ्य खराब है तो वो व्यक्ति कभी भी कुछ अच्छा न तो सोच सकता है और ना ही कुछ अच्छा कर सकता है.उसकी बुद्धि में इतना कुछ गलत भरा होता है कि उसे अच्छा दिखता भी नहीं है, सूझता भी नहीं है. सबसे ख़राब चीज़ ये होती है कि ज्ञान की बातें और अच्छी सलाह तो उसे पचती ही नहीं है . मिथ्या अहंकार,खुद को श्रेष्ठ मानकर वो अपनी अलग ही दुनिया में जीता है।ज़रा ज़रा सी बात पर उसका अहंकार आहत हो जाता है.कुल मिलाकर मानसिक विकार से ग्रसित होने के कारण वो खुद का एक काल्पनिक व्यक्तित्व बना लेता है कि बाकी सब उससे नीचे हैं और वो ही सुपर है। ये गलत फहमी जैसे जैसे बढ़ती है उसकी बददिमागी ज़्यादा से ज़्यादा बढ़ती जाती है और एक दिन वो बड़ा अपराधी बनकर तैयार हो जाता है.उसके चेहरे का तेज खतम हो जाता है .उसके व्यक्तित्व से दूर तक नकारात्मकता छलकने लगती है.वह दिन व दिन अपनी दुर्वृत्तियों के पोषण के लिए सबके साथ अभद्र व्यवहार शुरू कर देता है और ऐसे व्यवहार को जो भी समर्थन करता है कुछ दिन बाद खुद ही उसके बुरे व्यवहार का शिकार हो जाता है . इसलिए कोई गलत है तो सुधार करें, टोकिये.सही चीज सिखाइये....

मनुष्य जन्म का उद्देश्य

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  एक बात समझ नही आती कि  जब मनुष्य जन्म  का उद्देश्य अच्छे कर्म करके  ईश्वर  प्राप्ति करना ही है तो हम ऐसी चीजों को क्यों प्रमोट कर रहे हैं,ऐसी चीजों में क्यों खुशी ढूंढ रहे हैं जो ईश्वर से दूर ले जा रही हैं . क्लब पार्टी ,दारू पार्टी,डांस बार इन सब की क्यों ज़रूरत है ?क्यों जगह-जगह पवित्र कीर्तन ,भजन और यज्ञ का वातावरण नहीं बना देते ताकि सबकी अशुद्ध बुद्धि शुद्ध हो सके।क्यों स्कूल, कॉलेज में गुरुकुल जैसा माहौल नहीं बना देते? क्यों नैतिक  और आध्यात्मिक उन्नति पर ज़्यादा ज़ोर नही देते? संस्कृति, सभ्यता को नाश करने वाली चीजें भी परोसेंगे फिर अपराध बढ़ेंगे तो कहेंगे कि कलयुग आ गया, लोग बिगड गए.बिल्कुल वैसा ही जैसे कोई खुद ही नदी में डूब जाए और फिर चिल्लाकर कहे कि मुझे बचा लो.है ना कोरी मूर्खता? पहले मानवीयता बचाये तभी मानव सभ्यता बचेगी.हम खुद ही अपराधी तैयार कर रहे हैं फिर उन्हीं से परेशान हो रहे हैं और हम अपराध को मिटाने की इच्छा भी कर रहे हैं।कलयुग भी हम अपने कर्मों से बनाते हैं और सतयुग भी. --- https://youtube.com/@merirachnamereswar?si=eluR-g07t6fgf9g- 👆 ...

गलत सोच और कर्म पर नियंत्रण जरूरी

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जिंदगी में स्वतंत्रता जितनी जरूरी है उतना ही  नियंत्रण भी है।हर वक्त दी गई स्वतंत्रता घातक सिद्ध हो सकती है.भीतर और बाहर दोनो से नियंत्रण ज़रूरी है . आंत्रिक नियंत्रण (क्रोध ,द्वेष,अधीरता आदि पर) नहीं होगा तो बाहर की प्रतिक्रियाये दुर्घटना व विनाश का कारण बनेंगी. अजकल बढ़ रही सड़क दुर्घटनाएं भी इसी कारण से हो रही हैं कि लोग किसी को भी अपने से आगे निकलते हुए देखकर एकदम बौखला उठते हैं चाहे वो  सड़क पर गाड़ी चलाते हुये किसी का उससे   आगे निकल जाने की सामान्य सी बात क्यों ना हो . आजकल लोगों में अजीब सी अधीरता ,उतावलापन और  कुण्ठा पनप गई है. नैतिक और भावनात्मक  स्तर इतना गिर चुका है कि लोगो को ये ही समझ नही आ रहा कि किस बात पर नाराज होना चाहिये और किस पर नही . ऐसी छोटी छोटी बातों पर लोगो को आवेश में आते देखा है जो वास्तव में बहुत मामूली सी होती हैं. चेतना का गिरा हुआ स्तर ही ये सब करवाता है जब इंसान अपनी 'मै' से बाहर नही आ पाता .मेरा सम्मान ,मेरी पूजा ,सिर्फ मेरा अधिकार ,सब को खुद से नीचे देखने की तमन्ना ,किसी को सुख मे देखने से उत्पन्न दर्द और छटापटाहट...

पति-पत्नी का रिश्ता

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पति-पत्नी का रिश्ता कहते हैं दो आत्माओ का रिश्ता होता है। इस रिश्ते को अगर वफ़ा और निष्ठा के साथ निभाया जाए तो सबसे अच्छा रिश्ता है जो वृद्धावस्था में सबसे ज्यादा आत्मिक हो जाता है .भारतीय संस्कृति में तो पति को देवता माना जाता है .मगर ये ध्यान रखने योग्य बात है कि उसी पति को परमेश्वर माना जाता है जो चरित्र से अच्छा हो, व्यभिचारी को नहीं।एक पत्नी व्रती पति और पतिव्रता स्त्री का स्थान तो देवताओं की दृष्टि में भी उच्च होता है। भारतीय संस्कृति का सम्मान करने वाले तो इसे मानते भी हैं लेकिन आजकल पाश्चत्य सभ्यता से प्रभावित लोग इस रिश्ते की अहमियत भूल गए हैं, इसलिए छोटी-छोटी बातों में तलाक जैसी स्थिति आ जाती है दोनो ही पक्ष अगर प्यार और सम्मान की भावना रखते हुए रिश्ता निभाए तो इस रिश्ते की ऐसी दुर्दशा ना हो.आख़िर अन्य toxic रिश्ते भी तो हम निभाते ही हैं .पति-पत्नी के रिश्ते में तलाक का विकल्प होता है, इसलिए हम इस में सहनशीलता नहीं दिखाते। बस बात-बात में तलाक का विकल्प तलाशने लगते हैं.इसलीये अन्य रिश्तों की तरह इसे भी सही से निभाएं विकल्प ना ढूंढे।पति या पत्नी व्याभिचारी हो तो त्याग देना चाहि...

उद्देश्य हीन मनुष्य

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कहते हैं ये मनुष्य जन्म इतना दुर्लभ है कि देवता भी इसके लिए तरसते हैं पर मनुष्य इतना मूर्ख है कि इसका महत्व ही नहीं समझ पा रहा है.ईश्वर प्राप्ति के लिए ही प्रभु मनुष्य योनि प्रदान करता है और मनुष्य पर माया का ऐसा जादू चढ़ता है कि प्रभु के अलावा सारी चीजों में उसकी रुचि होती है, सारे काम उसे ज्यादा जरूरी होते हैं प्रभु के अलावा. कोई विवेकशील व्यक्ति ही समझ पाता है उद्देश्य  को, जीवन के महत्व को.यहां लोग ऐसी व्यवस्था करने में लगे हैं जैसे यहीं स्थाई ठिकाना रहने वाला है .जबकी सब जानते हैं कि जगत में कोई स्थायी नहीं है। फ़िर भी लगे हुए हैं सोना-चाँदी एकत्र करने में,मकान पे मकान बनाने में।इच्छाए इतनी ज्यादा है कि कोई भी इंसान प्रभु से प्रभु को नहीं मांगता बल्की धन दौलत ही मांगता रहता है।इच्छा पूरी होते ही फूला नी समाता और कुछ इच्छा के विरुद्ध हो जाए तो गालियां देना शुरू कर देता है।   जीवन के प्रति तो इतना मोह है कि बुढ़ापे के चरम पर पहुंच कर भी पैसे के हिसाब -किताब में लगा रहता है.बच्चे,फिर बच्चों के बच्चे, फिर उनके भी बच्चों को देखने की तमन्ना मे ईश्वर से और अधिक उम्र की कामन...

भीतर की सुन्दर दुनिया में रहें'

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जिंदगी को हंस के जिओ. हर बात पे मुंह फुलाना या सीरियस होना जरूरी नहीं है मैं तो कहती हूं लड़ाई में भी हसी  खोजो.बीच में भाव बदल के चुटकुले सुनाने लगो.कह दो के लड़ने का मन नहीं है.कुछ और सुना... सब दिमाग का खेल है मनोवृत्ति का खेल है.आपके हाथ में है क्यों दूसरे के खोपड़े के हिसाब से चलना. बाकी आपकी मर्जी..उसे चढाने दो त्यौरियां .तुम्हें प्रभावित ही नहीं होना है .तुम्हें ऐसा बन जाना है मानो सामने एक नादान बालक खड़ा है . जब तक विषय कोई ज़्यादा गंभीर न हो ,जैसे देश ,धर्म और मर्यादा के ख़िलाफ़ कोइ बात ,तब तक किसी विषय पर ज़्यादा तमतमाने की ज़रूरत नहीं है .न्याय संगत बात के लिए,नैतिकता के लिए लड़ाई सही,बाकी सब व्यर्थ है.इसलिए मौन रहना सीखो,भीतर ही भीतर प्रभु का चिंतन कर प्रसन्न रहना सीखो.प्रभु प्रेम रस का पान करो फिर बाहर सब फीका और रस हीन लगेगा.भीतर की दुनिया में जीना सीखो।तब जान पाओगे बाहर कुछ भी नहीं है।कुछ भी सुंदर नहीं है।जहां आनंद खोज रहे हो है ही नहीं।शांत रहकर प्रभु में खोने का आनंद जिसने पाया उसे बाहर की चीज़ से कोई मतलब नहीं होता। इसलिये भीतर की सुन्दर दुनिया में रहें बाहर तो कुछ भ...

मनुष्य हो तो मनुष्य बन रहो

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   मृत्यु के भय से अगर सही को सही और गलत को गलत ना कह सको,तो सन्देह  करो अपने मनुष्य होने पर . शक्तिशाली हो कर अगर किसी निर्बल की शक्ति न बन सको,तो संदेह करो अपने शक्तिशाली होने पर. संपन्न हो कर अगर मदद ना कर सको किसी निर्धन की,तो सन्देह करो अपनी सम्पन्नता पर . पुरुष हो कर अगर किसी नारी के सम्मान की रक्षा न कर सको,तो संदेह करो अपने पौरुष पर। धार्मिक हो कर भी अगर धर्म की रक्षा न कर सको, तो धिक्कार तुम्हारे धार्मिक होने पर.  मनुष्य हो तो मनुष्य बन रहो इस धरा पर, सिर्फ देह मनुष्य की होना ही मनुष्यता नहीं, समझो इस ध्येय को तो इंसान हो तुम  ना समझो तो चारा चर रहो कही। -
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दुनिया में हर व्यक्ति की अपनी अलग मनोवृत्ति है, अपना व्यवहार होता है और दूसरे हमें सिर्फ अनुमान के आधार पर ही जानते हैं.हम जैसे हैं वैसे रूप में हमें कोई -कोई ही समझता है।अगर कोई सही से समझ पाता है तो उससे संबंध अच्छे हो जाते हैं जो सही से नहीं समझ पाते उससे संबंध ख़राब हो जाते हैं। यहाँ पूरी दुनिया एक दूसरे के व्यवहार को अनुमान और अपनी कल्पनाओं के आधार पर ही ग्रहण करती है इसलिए ये सोच कर दुखी नहीं होना चाहिए की अमुक व्यक्ति हमें सही से नहीं समझता.हमें हमारे प्रभु सही से समझे बस। बाकी किसी को समझाने की ज़रूरत नहीं। किसी सामान्य व्यक्तित्व में इतनी क्षमता नहीं कि किसी अन्य व्यक्ति को सही से समझ सके। ये कार्य सिर्फ ईश्वर से जुड़ा, पवित्र हृदय का व्यक्ति ही कर सकता है .इसलिये प्रभु की नजर में सही बने रहकर निश्चिंत हो कर, हर काम कीजिए और मस्त रहिए।आपको सिर्फ प्रभु को प्रसन्न करना है सांसारिक लोगो को तो कोई कभी खुश कर ही नहीं पाया।उनके पास तो सिर्फ शिकायतों की लंबी सूची और उलाहने ही होते हैं। प्रभु के बनकर रहिए और सब प्रभु पर छोड़ दीजिए.कोई आपकी चिंता करे, आपको सही से समझ पाए तो ठीक अन्यथा ...

'समझ'

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दुनिया बड़ी विचित्र है यहां सब अपने को दूसरे से श्रेष्ठ मानते हैं और सबको ही एक दूसरे से शिकायत है।यहाँ कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसके सबके साथ संबंध अच्छे हों फिर भी दूसरे को खुद से निम्न और खुद को दूसरे से श्रेष्ठ मान कर चलते हैं. जरा विचार कीजिए अगर दोनों अच्छे होते तो ना एक दूसरे से दोनों को शिकायत होती न झगड़े.सारी समस्या का कारण है अपेक्षा, उम्मीद।अगर आप किसी से उम्मीद रखते हैं कि वो आपके अनुसार बने तो आपको भी उसके अनुसार बनना होगा।अन्यथा शिकायत करना बंद करे।जब आप खुद को बदलना नहीं चाहेंगे तो दूसरे से उम्मीद क्यों? इसलिए सुखी रहना है तो इच्छाओ पर नियन्त्रण रखें।दूसरो से सुख पाने की नहीं, सबको सुख देने की इच्छा रखें.जब तक स्वार्थी बने रहेंगे, सुख भोगने की इच्छा रखेंगे और दूसरे को अपने अनुकूल बनने की कोशिश करते रहेंगे तब तक दुख से नहीं बच पाओगे.और यहीं सारी उम्मीद क्लेश, द्वेष और विवाद उत्पन्न करती रहेंगी।जब तक मेरा - मेरा का भाव ख़तम नहीं होगा तब तक दूसरे के प्रति सहनुभूति और प्रेम का भाव नहीं होगा।और स्वार्थ और अपेक्षा ही दुख का मूल कारण है।उमर के अनुसार इच्छाएं और व्यवहार  पर...

कर्मा

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सृष्टि में जितने भी इंसान हैं सब प्रभु की मर्जी से प्रकट हुए हैं .लेकिन साथ ही सब अपना अपना प्रारब्ध, संचित कर्म लेकर चल रहे हैं।मनुष्य योनि सबसे श्रेष्ठ योनि मानी जाती है।अन्य सारी योनि तो भोग योनि है लेकिन मनुष्य योनि ही ऐसी योनि है जो अपने वर्तमान कर्मों के हिसाब से अच्छा या बुरा फल भोगती है और अच्छे कर्म करके ईश्वर की प्राप्ति भी कर सकती है इस योनि में जो भी कर्म करे बहुत सोच समझ कर करे। क्योंकि इस योनि में अगर आपने ईश्वर प्राप्ति नहीं की तो आपको अनेक योनियों में भटकना बढ़ेगा।मनुष्य शरीर पाकर इसलिए कोई भी गलत कर्म न करें.आप जिसके प्रति भी गलत कर्म करेंगे वो किसी ना किसी रूप में आपके सामने अगले जन्म में प्रकट होता रहेगा।इसलिए मोह का नाश करते हुए, विवेकशील बनते हुए हमें अध्यात्म और ईश्वर से जुड़कर अपनी जिंदगी सिर्फ कर्तव्य निर्वाह के लिए जीनी है.किसी की भी आत्मा को दुखाना या ईश्वर द्वार निर्मित इस दुनिया में किसी भी व्यक्ति की शारीरिक कमज़ोरी या मानसिक कमज़ोरी का उपहास करना, मज़ाक उड़ाना बहुत घातक हो सकता है  .यहां जिसको जो स्थिति मिली है सब अपने कर्मनुसर मिली है।इसलिए आप जिसका भ...

'तुम्हे मुबारक'(Hindi poem)

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मै  शांत हूँ,उद्विग्नता तुम्हें मुबारक़ मै पवित्र हूँ,अशुद्धता तुम्हें मुबारक़  मैं उन्मुक्त हूँ,बंधन तुम्हें  मुबारक़  मैं मौन हूँ,शोर तुम्हें मुबारक़  मै प्रीत हूँ,बैर तुम्हें मुबारक़  मै मृदु हूँ,कटुता तुम्हें मुबारक़  मैं क्षमा हूँ प्रतिशोध तुम्हें मुबारक़ || 

''मत भूलो ये भारत है''

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शादी की उम्र बढ़ाना और लिवइनरेलशनशिप को छोटी उम्र में ही परमिशन देना,समलैंगकिक विवाह की अनुमति  के समर्थन की बात करना। ये सब क्या मज़ाक है?कैसा  खिलवाड़ है संस्कृति के साथ। आखिर हम देश की संस्कृति का कचरा करने पर क्यों लगे हुए हैं। करना क्या चाह  रहे हैं ?क्या हम सभी को व्यभिचारी बनाना चाहते हैं? जो संस्कृति अपनी विशिष्टता के लिए विश्व भर में प्रसिद्द है उसे क्यों नष्ट करना चाह रहे हैं। जिस देश की शिक्षा में  संस्कार और मर्यादा की बात प्रमुख रूप से होती है और बाकी सब ज्ञान बाद में उस देश की पहचान हम क्यों  मिटाना चाहते हैं।मानती हूँ  की महिलाओं के विकास और शिक्षा व्यवस्था पर भी  उतना ही ज़ोर देने की ज़रूरत है   जितनी की पुरुषों पर। दोनों को समान उन्नति के अधिकार मिलने ज़रूरी हैं।परन्तु वर्तमान में दोनों को ही उन्नति के  नाम पर जो स्वतंत्रता दी जा रही है वो उचित नहीं है।महिलाओं ने तो स्वतंत्रता के नाम पर हद  ही कर दी है न तो  पहनावे में शालीनता बची है और न ही आचरण में. जिस देश में आत्म सम्मान की और चरित्र की रक्षा हेतु तमाम नारियाँ जौ...

"फौजी भाई"

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अपने लिये तो सभी जीते हैं जो दूसरों  के  लिए ज़िये वही मनुष्य है.हमारे देश के सुरक्षा प्रहरी,हमारे शेर दिल फौजी भाई इस कसौटी पर खरे उतरते हैं. प्रणाम हैं इनके ज़ज्बे को,इनकी श्रेष्ठता को,इनके साहस और शौर्य को. सामान्य उद्देश्य से जीने  के अवसर तो सभी को मिलते हैं मगर किसी विशिष्ट उद्देश्य (परमार्थ हेतु) हेतु मरने का अवसर यूँही नहीं मिलता.हमारे फौजी भाई चुनते हैं इस अवसर को और अजर-अमर हो जाते  हैं .तभी तो  इनकी  तुलना  संतों  से की  जाती  है.इन्हे  त्यागना  पड़ता  है हर चीज का मोह,जीना  होता है सिर्फ देश के लिये .देश ही इनके लिये भगवान  होता है और सारे कर्तव्य और कर्म  भी इसके लिये.इसलिए ये ही सच्चे हीरो हैं।ये ही विशिष्ट सम्मान के अधिकारी हैं।ये ही प्रशंसा के पात्र हैं।ये ही देश के अमूल्य रत्न हैं।अपनी जान बचाकर जीना तो कायरो का काम है.दूसरों  की जान  बचाकर जो शहीद हो जाये वही सच्चा इंसान है, सेना का जवान है .हम अपने घर मे आराम से  जो खा पी रहे हैं उसके पीछे इनके कितने ही भूखे पेट बीते दिन हैं.हम...

'शुद्ध भक्ति'

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'शुद्ध भक्ति ' शब्द को सुनकर मन में सभी के दिल में ये ख्याल तो ज़रूर आया होगा की भक्ति में शुद्ध और अशुद्ध  का क्या मतलब हुआ। दरअसल भक्ति में शुद्ध और अशुद्ध का सम्बन्ध भक्त की भावना से होता है। भक्त भी दो तरह के होते हैं- एक वो जो अपनी तमाम इच्छाओं की पूर्ती हेतु भक्ति करते हैं,जगह जगह के मंदिरों में  जाकर पूजा अर्चना करते हैं,धोक लगाते हैं कि अमुक समस्या या दुःख खत्म हो जाएगा तो इतने का प्रसाद चढ़ाएंगे  या कोई भी कार्य।कुछ मामलो में तो दूसरों के अहित की कामना से भी कुछ लोग पूजा करते हैं. सही इच्छाओं की पूर्ती के लिए की गई पूजा में  कोई बुराई नहीं है लेकिन ग़लत इच्छाओं के लिए की गई पूजा भी  पाप कर्म में ही आती है।सबसे निकृष्ट लोग वही होते हैं जो भक्ति की आड़ में अपनी ग़लत इच्छाओं की पूर्ती की  कामना रखते हैं।इनकी कोई कामना तंत्र -मंत्र से पूरी हो भी जाये तो ऐसे लोगो का अंत बड़ा भयावह होता है। ये ज़िंदगी मौत के बीच में झूलते रहते हैं और बड़ी ही दर्दनाक मौत होती है इनकी,और प्रेत योनि में जाते हैं। दूसरी भक्ति होती है-निःस्वार्थ भक्ति जिसमें कोई इच्छा नहीं होती।बस प्...

'असमानता क्यों '

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    समाज में कुछ चीज़े बड़ी अव्यवस्थित और अतार्किक हैं। पहले लड़की-लड़के में भेद की मानसिकता थी तो लड़किया दुखी और त्रस्त थीं। अब लड़कियों को इतना प्रोटेक्ट किया जा रहा है की लड़के असुरक्षित हो गए हैं। ऐसे ही कहीं बुजुर्गों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा की बात की जा रही है तो उन बहुओं  के साथ अन्याय हो रहा है  जो अपने ऊपर उन अत्याचारों को झेल चुकी हैं जो सास ने अपनी बुढ़ापे से पहले की उम्र में किये हुए थे। अब सास के पास तो बुढ़ापे की उम्र की सहानुभूति है स्वं के लिए लोगों से,परन्तु बहु को जो मानसिक बीमारियां  और शारीरिक बीमारियां उसकी वजह से मिली उनको समझने और सुनने वाला कोई नहीं। अब ऐसी स्थिति में विवाह से पहले बालक-बालिका असमानता को झेलने वाली उन बालिकाओं की स्थिति पर ज़रा  विचार कीजिये जो विवाह से पहले भी असमानता की वजह से पारिवारिक सुख से वंचित रही और विवाह के बाद  ससुराल में बहु से की जाने वाली सारी अपेक्षाओं की वजह से बाद में भी दुखी हो रही हैं। क्या हर परिवार की स्थिति और परस्थिति समान होती हैं ? नहीं !  सबको अलग-अलग माहौल और सुविधा-असुविधा मिलती हैं।...

'मै 'से परे ही ईश्वर हैं

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'मैं' अपने आप में एक बहुत ही छली  शब्द है.इसका कोई अर्थ है ही नहीं  क्योंकि शरीर तो आत्मा से चल रहा है  और आत्मा के शरीर से बाहर आते ही  सम्पूर्ण शरीर  का अस्तित्व ही समाप्त  हो जाता है.तो आत्मा ही मूल हुई. आत्मा ही ईश्वर है. ईश्वर ही प्रमुख हुए। फिर व्यर्थ का अहम्, व्यर्थ का भ्रम नहीं  पालना चाहिए की आप सब कर रहे हैं  क्योंकि आप कुछ भी करने लायक रहेंगे  या नहीं ये भी ईश्वर ही निश्चित करेंगे। आपकी हर सांस उसके हाथ में है। आपका प्रारब्ध व आपके आज के कर्म  ही आपका वर्तमान और भविष्य निर्धारित करते हैं. कर्म अच्छे हैं तो आपकी बुद्धि पवित्र  योजनाएं बनायेगी.अच्छे निर्णय  करवाएगी वरना गलत कर्म,गलत योजना  और निर्णय के लिए आपकी बुद्धि प्रेरणा  देगी जो आपके भविष्य के लिए घातक  होगी.धन, संपदा का आना या भौतिक  इच्छा पूरी होना सुख नहीं है।पवित्र बुद्धि  होना और हर कर्म पवित्र भाव लेकर  करना भविष्य के लिए सुख की गारंटी हो  सकती है।इसलिए 'मै' को नही भीतर  बैठे  प्रभु को ध्यान रख कर कर्म करें....

'परवरिश'

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मां -बाप के लिये बच्चों की परवरिश एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है लेकिन आज कल लोग इसे बहुत हल्के में लेते हैं। माँ-बाप की इस लापरवाही वृत्ति से ही अक्सर उनके बच्चे पथभ्रष्ट हो जाते हैं .उनका आचरण बिगड़ जाता है.वो  मनमानी करने लगते हैं.सही ग़लत की समझ न होने से कुछ भी ग़लत करने से नहीं डरते हैं. कई बार तो माँ बाप खुद ही इतने विवेकशून्य होते हैं कि वो बच्चों को सही और ग़लत का फर्क ही नहीं समझा पाते  हैं क्योंकि उन्हे खुद ही नैतिकता का ग्यान नहीं होता है या आधुनिक या दबंग बनाने की होड़ में वो अपनी संतान  को एकदम संस्कारहीन या बेहुदा बना डालते हैं. उनकी ये लापरवाही बाद में उनके लिये तो हानिकारक सिद्ध होती ही है साथ ही पूरे समाज के लिए भी घातक हो  जाती है.समाज में मूर्ख और अपराधी वर्ग ऐसे ही लोग तैयार कर देते हैं जो बच्चों की सही परवरिश नहीं करते. बच्चों को डॉक्टर ,इंजीनियर बना देना इतनी बड़ी बात नहीं होती जितना कि उन्हे संस्कारवान और मर्यादित  आचरण वाला बनाना.अच्छे संस्कार नहीं दिये जायें तो पीढ़ी दर पीढ़ी बेकार फसल ही तैयार होती  है.कुंठाग्रस्त,बिगढ़ैल मानसिकता का व्यक्त...

वास्तविक सुख

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ईश्वर का ज़िंदगी में आगमन एक उत्सव की तरह होता है।जैसे एक नवयुवती या नवयुवक जिनका विवाह तय होता  है वह अपनी होने वाली ससुराल  को लेकर जितने  उत्सुक और हर्षित होते  हैं  ठीक वैसे ही एक भक्ति में आने  वाला व्यक्ति अपने प्रभु या उस आध्यात्मिक लोक के प्रति दीवाना होता है।बस बड़ा अंतर ये होता है कि सांसारिक  रिश्तेदारी या ससुराल   में सुख मिलेगा या दुःख इसकी कोई गारण्टी नहीं होती पर प्रभु से रिश्तेदारी में परम सुख  और विश्वास ज़रूर मिलता है।एक ऐसा सुख जिसे पाकर फिर कुछ पाने की चाह नहीं रहती।  जिसके बाद सब तलाश खत्म हो जाती है। जिसको पाकर सब तृष्णाएं मिट जाती हैं।   एक संपूर्णता का अहसास होने लगता है। बस यही होता है वो सुख तो जो तुम्हें पाना था। यही थी जिंदगी की प्रथम  और अंतिम खोज,जिसकी शुरुआत जीवन के आरंभ से ही की जानी चाहिए थी पर नहीं की गई कोई कोशिश.  'कोरोना' मे पूरी दुनिया ने जिस प्रभु को भरपूर  याद किया था मगर फिर सब सामान्य होते ही सहजता से भुला  दिया। उस समय तो हर व्यक्ति बड़ी बड़ी बातें कर रहा था अध्यात्...

'लक्ष्य से भटकाव'

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 इंसान की तीन मूलभूत आवश्यकताएँ हैं रोटी ,कपड़ा और मकान। इन तीनो आवश्यकताओं  का पूरा होना बेशक  बहुत ज़रूरी है लेकिन आधुनिक युग ( कलयुग ) में इंसान ने इसे आवश्यकता नहीं अपने जीवन का मूल लक्ष्य या  उद्देश्य ही बना लिया है।उसके जीने का उद्देश्य अधिक से अधिक पैसा कमाकर अच्छे से अच्छे व्यंजन खाना ,महंगे से  महंगे कपड़े पहनना,बड़े से बड़ा मकान बनाना हो गया है.उनकी सोच  सिर्फ़ स्वादिष्ट व्यंजन ,मदिरा,डांस पार्टी  फैशनेबल ड्रेसेस,महंगी गाड़ी तक सीमित हो चुकी है।  ज़िंदगी का लक्ष्य सिर्फ कैसे भी कर के किसी उच्च पद को हासिल कर लेना और फिर किसी पैसे वाले  परिवार में सुन्दर लड़की या लड़के से शादी करना हो गया है और अंत में फिर अपने मनुष्य जन्म का उद्देश्य समझे  बिना भगवत भाव हीन संतान पैदा कर इस दुनिया से अलविदा कर जाना ।  इनका ये क्रम जाने कितने जन्मों तक चलता रहेगा।भगवान विवश हो कर बार-बार भेजते रहेंगे इस दुनिया में  इन्हें अपने द्वारा निर्धारित परीक्षा में असफल होने की वजह से. लेकिन इनकी बुद्धि में ये स्पष्ट नहीं हो पाएगा कि  आखिर कितने भी म...

भारतीय संस्कृति के प्रतिकूल है स्त्री-पुरुष दोस्ती

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  स्त्री-पुरूष की दोस्ती एक विदेशी  मानसिकता है .भारतीय संस्कृति में इसका कोई अर्थ नहीं है .यहाँ वेदों में स्त्री को पूजनीय माना गया है,तो यहाँ हर पुरूष को स्व पत्नी के अतिरिक्त, हर स्त्री को माँ ,बहन और बेटी के रुप में देखने को कहा है और दूसरी तरफ हर स्त्री को भी स्व पति के अतिरिक्त, अन्य सभी पुरुषों को पिता,बेटा या भाई के रुप में देखने को कहा गया है . फिर एक स्त्री या पुरूष की दोस्ती का अर्थ ही क्या है?अगर अपनत्व ही दिखाना है तो भाई-बहन के रूप में दिखायें.रिश्ता ही बनाना है तो मर्यादा और पवित्रता का बनायें। सच्चाई तो ये है कि भावों की अशुद्धता की वजह से ही ऐसा कर पाना मुश्किल होता है.अगर भाव पवित्र हैँ तो भाई -बहन के जैसे भाव रखकर निभायें ये रिश्ता.मगर कहाँ !अगर भाई-बहन जैसा सम्बंध हुआ तो मर्यादा बीच में आ जाएगी और मित्रवत व्यवहार हुआ तो उन्मुक्तता मिल ज़ाएगी हर प्रकार की.'दोस्ती' का ही रिश्ता रखना है तो भाई-बहन जैसी ही मर्यादा और पवित्रता होनी चाहिए उस में भी. देखिये वस्तु स्थिति ये है कि हर व्यक्ति को अनुशासन में ,मर्यादा में रहना मुश्किल लगता है.मनुष्य की यही दुर्बलता त...