'कोई दर्द '



लब पर फ़ीकी हँसी सहेजे, एक धोख़े में जीता है

बाहर से ख़ुश दिखता हो पर, भीतर एकदम रीता है ।

कितने रिश्ते दिल से जाने ,कितने मजबूरी में ढोता है

कोई दर्द तो साथ है उसके ,चुपके -चुपके रोता है ।

प्यार बनाया मज़बूरी को ,या मज़बूरी से प्यार किया

हालातों की मार थी ऐसी ,ज़ज़्बातों से हार गया ।

दिल में ज़ख्म छुपाकर जाने, किस धागे से सीता है

राज नहीं खुलता कोई दिल का ,पत्थर बन कर जीता है । ।

-अंशु चौहान




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