नारी सौन्दर्य को चार -चाँद लगाने में गहने अपना विशेष महत्व रखते हैं । प्राचीन काल में ये गहने फूलों ,पत्तियों आदी से निर्मित होते थे । आज स्वर्ण ,रजत ,हीरे आदी से निर्मित गहने प्रचलन में हैं । ये सब सभ्यता ,संस्कृति और आवश्यकता के विकास से संभव हुआ है । इस विकास ने हमे ये आभूषण तो प्रदान किए मगर हमारी सुरक्षा इनके साथ ही ख़तरे में आ गई है । इन आभूषणों को धारण करके बेखौफ़ कैसे जिया जाए इसका कोई उत्तर नहीं है । ये आपके ख़ुद के हाथ में है कि आप इनको पहन कर कहीं भी जाते हुए अपनी सुरक्षा कैसे करते हो । गहनों के साथ -साथ ख़ुद की असुरक्षा के भय से ही आज हर महिला इन गहनों का नाम मात्र ही उपयोग कर पा रही है । नारी के श्रृंगार और वैवाहिक जीवन के लिए सबसे ज़रूरी माना जाने वाला गहना 'मंगल सूत्र 'आज स्त्री के गले से दूर होता जा रहा है । सोने की चेन आदि पहनने से पहले भी उसे हज़ार बार सोचना पड़ता है क्योंकि अपनी ज़िन्दगी को ख़तरे में डालने से हर कोई डरता है । चेन स्नैचिंग की घटना को अंज़ाम देने वाले इन अपराधियों के डर से आज हर महिला गले में सिंपल सा धागा या मोती आदि की माला पहनना पसंद कर रही है । ये स्थिति पुलिस व प्रशासन व्यवस्था पर तो प्रश्न-चिन्ह लगा ही रही है साथ ही समाज में बढ़ रही संस्कारहीनता को भी उजागर कर रही है । अपराधी- तत्वों का समाज में बढ़ना नैतिक मूल्यों और संस्कारों में गिरावट को दर्शाता है अतः इस विषय पर ध्यान देने की भी उतनी ही ज़रूरत है जितनी कानून,न्याय आदि पर । नैतिकता तो आंतरिक गुण है ,आत्मा का विषय है । जब तक इसकी उपयोगिता और अनिवार्यता पर जोर नहीं दिया जाएगा तब तक व्यवस्थापिका ,कार्यपालिका और न्याय पालिका कुछ अधिक नहीं कर पाएंगी । यदि सभी व्यक्ति आत्मानुशासित और नैतिकता से नियंत्रित हो जाएं तो दंड व्यवस्था आदि की जरुरत ही नहीं होगी । हर विद्यालय में ,कार्यालय में और हर उद्यानों में नैतिक मूल्यों से युक्त सन्देश अंकित किए जाएं । इनकी उपयोगिता और इनके पालन करने पर प्रोत्साहन राशि की घोषणा की जाए । जब अच्छे काम करने के लिए प्रोत्साहन राशि मिलेगी तो कोई भी व्यक्ति गलत कार्य करने से बचेगा ।
मनुष्य हो तो मनुष्य बन रहो
मृत्यु के भय से अगर सही को सही और गलत को गलत ना कह सको,तो सन्देह करो अपने मनुष्य होने पर . शक्तिशाली हो कर अगर किसी निर्बल की शक्ति न बन सको,तो संदेह करो अपने शक्तिशाली होने पर. संपन्न हो कर अगर मदद ना कर सको किसी निर्धन की,तो सन्देह करो अपनी सम्पन्नता पर . पुरुष हो कर अगर किसी नारी के सम्मान की रक्षा न कर सको,तो संदेह करो अपने पौरुष पर। धार्मिक हो कर भी अगर धर्म की रक्षा न कर सको, तो धिक्कार तुम्हारे धार्मिक होने पर. मनुष्य हो तो मनुष्य बन रहो इस धरा पर, सिर्फ देह मनुष्य की होना ही मनुष्यता नहीं, समझो इस ध्येय को तो इंसान हो तुम ना समझो तो चारा चर रहो कही। -

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