"उसका जादू "












मासूम सी उछल -कूद ,नन्ही निश्छल- ऑंखें और उस पर उसका नन्हा सा आकार!इन सब चीज़ों ने मुझे अनायास ही अपनी और आकर्षित किया । यह एक नन्हा सा पिल्ला था ,जो मुझे लोगों की भीड़ से अलग एक अपनेपन का अहसास दे रहा था  । मैं इसकी बचकानी हरक़तों से बड़ा ही सुकून पा रही थी । मैं उसे देखकर सोचती रही काश लोग भी ऐसे ही निश्छल होते। माना के  ये पशु विवेक शून्य होते हैं लेकिन इनका छल रहित ,भोला चेहरा  इंसान से ज़्यादा आकर्षक होता है । उसकी बचकानी हरक़तें ,नन्ही सी नाक ,टिमटिमाती आँखें और बेवज़ह से अचानक उछल पड़ना मुझे पागल सा बना रहे थे । उसकी इन हरक़तों से मन चाहा कि मैं उसे दबोच लूँ !लेकिन फ़िर  याद आया अरे नहीं इसमें रिस्क है । मैं उसे एक खिड़की से निहार रही थी और वो मेरी इन मानसिक उद्दंडताओं से अनभिज्ञ था । फिर अचानक वो न जाने कहाँ ग़ायब हो गया ।

 मैंने भी  बाद में विचार किया कि मैं भी कितनी मूर्ख थी !गली के एक पिल्ले पर इस क़दर मोहित हो गयी थी । उसको गोद में लेने की सोच रही थी । वह नहाया हुआ और पालतू भी तो नहीं था । गंदगी ,कीटाणु... आदि के ख़याल.....बीमार पड़ जाती ...आदि। इस तरह के कई प्रश्न दिमाग में आना शुरू हो चुके थे ... ।

सच्चाई तो ये है ,ये है मानव प्रकृति । हर चीज़ में सोचना ,बुद्धि का अनावश्यक प्रयोग ,हर बात में स्वार्थी और पूर्वाग्रही होना । तभी तो इंसानों की तमाम भीड़ में भी उतना आनंद नहीं मिलता जितना इन मासूमों की छलरहित गतिविधियों व व्यवहार में मिलता है ।




(2003 )

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