माथे की तनी लकीरों से, उसके 'तंस 'नज़र आ जाते हैं
दिल ,जुबां से लेकिन फिर भी, इनका असर छुपाते हैं
उसके मन में मेरी ख़ातिर, कितने शिक़वे रह जाते हैं
मुझसे मिलते हैं जब भी, कुछ कहते -कहते रह जाते हैं
ख़त्म सिलसिला अभी नहीं ये, जाने क्या-क्या बाक़ी है
भूला  सा लगता है यहाँ पर, शब्द कोई जो 'माफ़ी 'है । ।


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मनुष्य हो तो मनुष्य बन रहो

भीतर की सुन्दर दुनिया में रहें'